CBSE Class 10 Hindi पाठ 01 माता का आँचल Worksheet

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Chapter-wise Worksheet for Class 10 Hindi पाठ 1 माता का आँचल

Students of Class 10 should use this Hindi practice paper to check their understanding of पाठ 1 माता का आँचल as it includes essential problems and detailed solutions. Regular self-testing with these will help you achieve higher marks in your school tests and final examinations.

Class 10 Hindi पाठ 1 माता का आँचल Worksheet with Answers

1. माता का अँचल (लेखक: शिवपूजन सहाय)

 

पाठ का सार

प्रस्तावना: लेखक ने 'माता का अँचल' पाठ में ग्रामीण अंचल के बचपन और शैशवकाल की उन स्वाभाविक क्रीड़ाओं तथा बाल-सुलभ गतिविधियों को बहुत सुंदर ढंग से उकेरा है, जिसमें माता-पिता के निस्वार्थ लाड-प्यार और बाल-मंडली द्वारा रचे जाने वाले तरह-तरह के खेलों को दर्शाया गया है। लेखक ने इस बात को भली-भाँति स्पष्ट किया है कि भले ही शिशु का अधिकांश समय अपने पिता के साथ बीतता हो और दोनों के बीच गहरा स्नेह संबंध हो, परंतु जीवन में आने वाले किसी भी अचानक संकट या विकट परिस्थिति के समय उसे केवल अपनी माता के आँचल में ही परम शांति और परम सुरक्षा का अहसास होता है। ऐसे कठिन समय में पिता का संबल भी माता की ममता और स्नेहिल आंचल की गोद के सामने कमज़ोर प्रतीत होता है।

बचपन से पिता के साथ अधिक: लेखक अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि वे आरंभ से ही अपनी माता की तुलना में अपने पिता (बाबू जी) के अधिक निकट रहते थे। माता के साथ उनका संबंध केवल स्तनपान करने तक ही सीमित था। बाबू जी सुबह उठकर, स्नान आदि से निवृत्त होकर जब पूजा-अर्चना के लिए बैठते थे, तो वे लेखक को भी अपने साथ नहला-धुलाकर पूजा में शामिल कर लेते थे। वे लेखक के माथे पर भभूत का सुंदर त्रिपुंड (तिलक) लगाते थे। लेखक के सिर पर लंबे-लंबे बाल थे, जिससे भभूत लगाने के बाद वे हुबहू 'बम-भोला' जैसे प्रतीत होने लगते थे। बाबू जी उन्हें बड़े प्यार से 'भोलानाथ' कहकर पुकारते थे, जबकि उनका वास्तविक और दस्तावेज़ी नाम 'तारकेश्वरनाथ' था। लेखक अपने पिता को 'बाबू जी' और माता को 'मैया' कहकर संबोधित करते थे। जब बाबू जी रामायण का पाठ करते थे, तो लेखक उनके समीप बैठकर दर्पण में अपना चेहरा निहारते रहते थे और जैसे ही बाबू जी की दृष्टि उन पर पड़ती, वे शर्माकर दर्पण नीचे रख देते थे, जिसे देख बाबू जी मंद-मंद मुस्कुरा उठते थे।

पिता जी की ‘रामनामा बही’ और राम-नाम की गोलियाँ: बाबू जी दैनिक पूजा-पाठ समाप्त करने के उपरांत अपनी विशेष 'रामनामा बही' में एक हज़ार बार 'राम-राम' लिखते थे। इसके पश्चात वे कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों पर 'राम-राम' लिखकर उन्हें आटे की छोटी गोलियों में लपेटते थे और गंगा किनारे जाकर उन गोलियों को एक-एक करके पानी में फेंककर मछलियों को खिलाते थे। इस पूरी यात्रा के दौरान लेखक अपने पिता के कंधे पर बैठे रहते थे और पिता को पानी में आटे की गोलियाँ फेंकते देख खिलखिलाकर हँसा करते थे। गंगा से वापस लौटते समय बाबू जी रास्ते में पड़ने वाले पेड़ों की झुकी हुई डालियों पर लेखक को बैठाकर झूला झुलाते थे। कभी-कभी वे लेखक के साथ कुश्ती लड़ने का अभिनय भी करते थे और स्वयं नीचे गिरकर लेखक के बल को बढ़ावा देते थे। तब लेखक उनकी छाती पर चढ़कर उनकी मूँछें खींचने का प्रयास करता, जिसे वे हँसते हुए छुड़ाते और प्यार से लेखक का गाल चूम लेते थे।

गोरस और भात का भोजन: बाबू जी जब लेखक को भोजन कराने बैठते, तो वे फूल के एक सुंदर कटोरे में दूध और चावल (गोरस और भात) को मिलाकर थोड़ा-थोड़ा करके खिलाते थे। परंतु, लेखक की मैया को हमेशा यह लगता था कि बच्चे का पेट अभी पूरी तरह नहीं भरा है। वह बाबू जी से कहती थीं कि पुरुषों को बच्चों को भोजन कराने का सही सलीका नहीं आता; वे छोटे-छोटे निवाले खिलाते हैं जिससे बच्चे को लगता है कि उसने बहुत खा लिया। वे कहती थीं कि बच्चों को हमेशा बड़े-बड़े निवाले (भर-मुँह कौर) खिलाने चाहिए, क्योंकि जब 'महतारी' (माँ) अपने हाथ से खिलाती है, तभी बच्चे का पेट वास्तव में भरता है। इसके बाद मैया स्वयं अपने हाथों से कभी तोता, कभी मैना, तो कभी कबूतर के नाम के बड़े-बड़े निवाले बनाकर यह कहते हुए खिलाती थीं कि "जल्दी खा लो, नहीं तो पक्षी उड़ जाएँगे।" भोजन समाप्त होते ही बाबू जी उन्हें खेलने की अनुमति देते थे और लेखक अपनी बाल-मंडली के साथ बाहर निकल जाते थे।

माँ तेल की उबटन करती तब तरह-तरह के खेल: कभी-कभी लेखक जब बाहर खेल रहे होते, तो मैया उन्हें अचानक पकड़ लेती और उनके रोने-चिल्लाने के बावजूद उनके सिर पर कड़वा तेल (सरसों का तेल) डालकर उनके बालों की अच्छी मालिश कर देती थी। बाबू जी इस बात पर मैया पर बिगड़ते थे, परंतु मैया पूरे सलीके से उबटन और तेल लगाने के बाद ही उन्हें छोड़ती थी। इसके बाद वह उनके माथे पर काजल की बिंदी लगाती, उनके बालों की चोटी गूँथकर उसमें फूलदार लट्टू बाँधती और उन्हें रंग-बिरंगा कुर्ता-टोपी पहनाकर बिल्कुल 'कन्हैया' (श्री कृष्ण) की तरह सजा देती थी। लेखक रोते-सिसकते हुए बाहर आते, जहाँ उनके हमउम्र सखाओं का झुंड उनका इंतज़ार कर रहा होता था। साथियों को देखते ही वे अपना सारा रोना-धोना भूल जाते और बाबू जी की गोद से उतरकर खेल और नाटकों की अपनी अनोखी दुनिया में खो जाते थे। वे चबूतरे के एक कोने को रंगमंच बनाते, बाबू जी की चौकी को दुकान बनाते, मिट्टी के ढेलों से लड्डू, पत्तों से पूरी-कचौड़ी और फूटे घड़ों के टुकड़ों से बताशे बनाकर मिठाई की दुकान सजाते थे। बच्चे ही खरीदार होते और बच्चे ही दुकानदार। थोड़ी देर बाद दुकान बंद करके वे मिट्टी और तिनकों से सुंदर घरौंदा (छोटा घर) बनाते, जहाँ पानी को घी, रेत को चीनी मानकर दावत (ज्योंनार) की तैयारी की जाती थी। दावत की पंक्ति (पांत) में जैसे ही बाबू जी आकर बैठते, बच्चे शरमाकर और हँसते हुए अपना घरौंदा बिगाड़कर भाग खड़े होते थे।

बच्चों की बारात और खेती: कभी-कभी बच्चे बारात निकालने का खेल खेलते थे। टिन के बक्से से शहनाई बजाई जाती, आम की गुठली को घिसकर बाजा बनाया जाता और बारात चबूतरे के एक कोने से दूसरे कोने तक जाती थी। बारात के स्वागत के लिए कोने को आम और केले के पत्तों से सजाया जाता था। लाल कपड़े से ढकी एक छोटी पालकी में दुल्हन को बैठाया जाता था। जब बारात वापस लौटती और बाबू जी मज़ाक में पालकी का पर्दा उठाकर दुल्हन का चेहरा देखने का प्रयास करते, तो सभी बच्चे ज़ोर से हँसते हुए भाग जाते थे। इसके उपरांत, बाल-मंडली खेतों की जुताई और बुआई का खेल खेलती थी। चबूतरे पर रहट और कुआँ बनाया जाता था, दो बच्चे बैल बनते और कंकड़-पत्थरों को बीज मानकर बोया जाता था। फसल तैयार होते ही उसे काटकर, बैलों से रौंदकर और मिट्टी के बर्तनों से नापकर राशि तैयार की जाती थी। इस बीच बाबू जी आकर मज़ाक में पूछते, "भोलानाथ, इस साल की खेती कैसी रही?" और बच्चे अपनी बनाई फसल छोड़कर खिलखिलाते हुए भाग जाते थे।

पालकी को देख शरारत: जब कभी बच्चे सड़क से गुज़रते हुए किसी दूल्हे की पालकी को देखते, तो वे बहुत ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लगते थे - "रहड़ी में रहड़ी पुरान रहड़ी, डोला के कनिया हमार मेहरी!" एक बार इसी तरह चिल्लाने पर राह से गुज़रने वाले एक वृद्ध दूल्हे ने बच्चों को बहुत दूर तक खदेड़कर पत्थरों और ढेलों से मारा था। उस बूढ़े दूल्हे का अजीब और बदसूरत चेहरा लेखक को आज भी याद है। वे मज़ाक में कहते हैं कि पता नहीं उस दूल्हे को कैसी दुल्हन मिली होगी, क्योंकि वैसा 'घोड़े जैसा मुँह वाला' आदमी उन्होंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा था।

जब मूसन तिवारी को चिढ़ाया: एक दिन जब तेज आंधी आई, तो चारों ओर काले बादल छा गए और धूल उड़ने लगी। बच्चे आंधी का आनंद लेने के लिए आम के बगीचे की ओर भागे। बारिश शुरू होते ही वे पेड़ों की जड़ों से चिपक कर खड़े हो गए। बारिश रुकते ही बगीचे में कई बिच्छू निकल आए, जिससे डरकर बच्चे भागने लगे। रास्ते में उन्हें उनके गाँव के एक बुजुर्ग मूसन तिवारी मिले। बाल-मंडली में शामिल एक ढीठ लड़के 'बैजू' ने मूसन तिवारी को चिढ़ाते हुए कहा - "बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा!" सभी बच्चों ने भी बैजू के सुर में सुर मिलाकर यही चिल्लाना शुरू कर दिया। तिवारी जी बहुत क्रोधित हुए और सीधे बच्चों के स्कूल (पाठशाला) में शिकायत करने पहुँच गए। गुरु जी ने तुरंत चार लड़कों को भेजकर भोलानाथ को पकड़वा मँगाया (बैजू तो भाग खड़ा हुआ था)। पाठशाला में गुरु जी ने भोलानाथ की जमकर खिंचाई और पिटाई की। जब बाबू जी को इस बात का पता चला, तो वे तुरंत स्कूल दौड़े आए। उन्होंने रोते हुए भोलानाथ को गोद में उठाया, पुचकारा और गुरु जी से मिन्नतें करके उन्हें घर ले चले। रास्ते में पुनः बच्चों का झुंड मिला जो गा रहा था - "माई पकाई गरर-गरर पूआ, हम खाइब पूआ, ना खेलब जुआ!" उन्हें देखते ही भोलानाथ अपना सारा दर्द और रोना भूल गए और बाबू जी की गोद से उतरकर बच्चों की टोली में शामिल हो गए। वे सब मिलकर मक्के के खेत में घुस गए और चिड़ियों को उड़ाने का मज़ा लेने लगे।

चूहे के बिल से साँप निकला: एक दिन बच्चे एक टीले पर खेल रहे थे। वहाँ उन्हें एक चूहे का बिल दिखाई दिया। बच्चे मज़ाक में उस बिल में नीचे की ओर से पानी डालने लगे। वे सोच रहे थे कि बिल से चूहा बाहर निकलेगा, परंतु अचानक उस बिल से एक भयानक काला साँप बाहर निकल आया। साँप को देखते ही बच्चे अत्यधिक भयभीत हो गए और चिल्लाते हुए बेतहाशा भागने लगे। भागते समय कोई गिरा, तो किसी को चोट लगी। भोलानाथ का सारा शरीर काँटों से छिल गया और पैरों के तलवे लहूलुहान हो गए। वे सीधे भागते हुए अपने घर पहुँचे। बाबू जी बरामदे (ओसारे) में बैठकर हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे, उन्होंने भोलानाथ को बहुत पुकारा, परंतु भोलानाथ ने उनकी पुकार अनसुनी कर दी और सीधे घर के भीतर जाकर अपनी मैया की गोद में शरण ली। वे भय से बुरी तरह काँप रहे थे और उनकी आँखें डर के मारे खुल नहीं रही थीं। मैया ने अपना सारा काम छोड़ दिया और रोते हुए उन्हें गले से लगा लिया। उन्होंने तुरंत हल्दी पीसकर उनके घावों पर लगाई। घर में कोहराम मच गया। इसी बीच बाबू जी भी दौड़ते हुए आए और उन्होंने मैया की गोद से भोलानाथ को अपनी गोद में लेने का प्रयास किया, परंतु भोलानाथ ने अपनी माता के स्नेह और परम शांति प्रदान करने वाले आंचल की सुरक्षित छाँह को कभी नहीं छोड़ा।

 

शब्दार्थ

 

पृष्ठ संख्या 1

अँचल - गोद, आंचल। मृदंग - एक प्रकार का पारम्परिक वाद्य-यंत्र। तड़के - भोर, सुबह-सुबह। भभूत - राख। दिक्क करना - परेशान करना, तंग करना। लिलार - ललाट, माथा। त्रिपुंड - एक विशेष प्रकार का तिलक जिसमें माथे पर तीन आड़ी या अर्धचंद्राकार रेखाएँ खींची जाती हैं। आईना - दर्पण। निहारा - देखा.

 

पृष्ठ संख्या 3

शिथिल - कमज़ोर, थका हुआ। उतान - पीठ के बल सीधे लेटना। फूल - एक चमकदार मिश्रित धातु जिससे सुंदर कटोरे और बर्तन बनाए जाते हैं। गोरस - गाय का दूध या दही। सानकर - मिलाकर। अफ़र जाना - पेट पूरी तरह भर जाना। ठौर - स्थान, जगह। मरदुए - पुरुष, मर्द। महतारी - माता, माँ.

 

पृष्ठ संख्या 4

कड़वा तेल - सरसों का तेल। बोधकर - सराबोर करके, पूरी तरह भिगोकर। बाट-जोहना - इंतज़ार करना, राह देखना। हमजोली - साथी, मित्र। चंदोआ - छोटा शामियाना या तंबू। बटखरा - नापने या तोलने का बाँट। घरौंदा - छोटा मिट्टी का घर। ज्योंनार - भोज, दावत। पांत - पंक्ति। जीमने - भोजन करने के लिए। भोज - भोजन का सामूहिक आयोजन.

 

पृष्ठ संख्या 5

तंबूरा - एक तार वाला वाद्य यंत्र। अमोला - गुठली से उगने वाला आम का छोटा पौधा। ओहार - परदे के लिए डाला गया कपड़ा। निरखना - देखना, निहारना। कसोरा - मिट्टी का बना छोटा प्याला या कटोरा। मोट - कुएँ से पानी खींचने के लिए बना चमड़े का बड़ा थैला। कियारी - खेत का छोटा हिस्सा। ओसाना - भूसे और अनाज को हवा की मदद से अलग करना। बटोही - राहगीर, यात्री.

 

पृष्ठ संख्या 6

रहड़ी - अरहर की दाल। नौ दो ग्यारह होना - भाग जाना। चिरौरी - प्रार्थना, विनती.

 

पृष्ठ संख्या 7

पराई पीर - दूसरों का दर्द या पीड़ा। लहूलुहान होना - खून से लथपथ होना.

 

पृष्ठ संख्या 8

ओसारा - बरामदा। कुहराम मचना - अत्यधिक शोर या रोना-पीटना मचना.

 

अभ्यास प्रश्नोत्तर

 

I. बहुविकल्पी प्रश्न

 

Question 1. लेखक के पिता उन्हें प्यार से किस नाम से पुकारते थे?
(a) तारकेश्वरनाथ
(b) भोलानाथ
(c) भोलेशंकर
(d) दीनानाथ
Answer: (b) भोलानाथ
In simple words: लेखक का वास्तविक नाम तारकेश्वरनाथ था, परंतु उनके पिता उन्हें स्नेह से 'भोलानाथ' कहकर बुलाते थे।

Exam Tip: लेखक के दोनों नामों - वास्तविक नाम (तारकेश्वरनाथ) और पुकारू नाम (भोलानाथ) - के अंतर को अच्छे से याद रखें।

 

Question 2. जब लेखक के बाबू जी रामायण का पाठ करते थे, तब वे उनकी बगल में बैठकर क्या करते थे?
(a) वे भी उनके साथ-साथ पाठ करते थे
(b) खेलते रहते थे
(c) आईने में अपना मुँह निहारा करते थे
(d) मइयाँ को आवाज़ लगाया करते थे
Answer: (c) आईने में अपना मुँह निहारा करते थे
In simple words: बाबू जी के पूजा करते समय लेखक उनके पास बैठते थे और चुपचाप दर्पण (शीशे) में अपना चेहरा देखकर खुश होते थे।

Exam Tip: पाठ के अनुसार, लेखक बाबू जी के पाठ करते समय दर्पण में अपना चेहरा 'निहारा' करते थे, यह वाक्य सीधे पाठ से लिया गया है।

 

Question 3. लेखक के पिता जी अपनी 'रामनामा बही' पर राम-नाम कितनी बार लिखते थे?
(a) सौ बार
(b) पाँच सौ बार
(c) हज़ार बार
(d) दो हज़ार बार
Answer: (c) हज़ार बार
In simple words: बाबू जी अपनी दैनिक पूजा के अंग के रूप में अपनी विशेष बही पर प्रतिदिन एक हज़ार बार 'राम-राम' लिखते थे।

Exam Tip: कागज़ के टुकड़ों पर राम-नाम लिखने की संख्या 'पाँच सौ' थी, परंतु रामनामा बही पर लिखने की संख्या 'एक हज़ार' थी। इन दोनों में भ्रमित न हों।

 

Question 4. लेखक के पिता जी लेखक से कुश्ती लड़ते वक्त शिथिल क्यों पड़ जाते थे?
(a) थकान के कारण
(b) ढलती उम्र के कारण
(c) लेखक के बल को बढ़ावा देने के लिए
(d) भूख लगने के कारण
Answer: (c) लेखक के बल को बढ़ावा देने के लिए
In simple words: बाबू जी कुश्ती के खेल में जानबूझकर खुद हार जाते थे ताकि उनके नन्हें बेटे भोलानाथ का हौसला और उत्साह बढ़ सके।

Exam Tip: पिता का स्वयं हार जाना उनके असीम वात्सल्य और बच्चे के आत्मविश्वास को बढ़ाने के प्रयास को दर्शाता है।

 

Question 5. लेखक की माँ के अनुसार बच्चे को किस प्रकार खिलाना चाहिए?
(a) थोड़ा-थोड़ा करके दिन में कई बार
(b) दिन में तीन-चार बार भर पेट
(c) जब भी खिलाएँ भर-मुँह के बड़े-बड़े कौर खिलाएँ
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (c) जब भी खिलाएँ भर-मुँह के बड़े-बड़े कौर खिलाएँ
In simple words: मैया का मानना था कि बच्चे को हमेशा बड़े-बड़े निवाले खिलाने चाहिए, क्योंकि छोटे निवाले खाने से बच्चे का पेट वास्तव में नहीं भरता।

Exam Tip: माँ के ममतामयी दृष्टिकोण के अनुसार 'बड़े-बड़े कौर' खिलाने से ही बच्चे का पेट भरता है, जिसे वे 'महतारी के हाथ से खाना' कहती हैं।

 

Question 6. लेखक 'कन्हैया' कैसे बन जाते थे?
(a) दूध-दही खाकर
(b) गइयों को चराकर
(c) गूँथी हुई चोटी में फूलदार लट्टू बँधवाकर तथा रंगीन कुर्ता-टोपी पहनकर
(d) साथियों के साथ बाँसुरी बजाकर
Answer: (c) गूँथी हुई चोटी में फूलदार लट्टू बँधवाकर तथा रंगीन कुर्ता-टोपी पहनकर
In simple words: जब मैया लेखक के बालों में तेल लगाकर चोटी गूँथती थी, लट्टू बाँधती थी और रंगीन कपड़े पहनाती थी, तो वे कन्हैया जैसे लगते थे।

Exam Tip: 'कन्हैया' बनने के पीछे मैया द्वारा किए जाने वाले उनके विशेष श्रृंगार (चोटी गूँथना, लट्टू बाँधना और रंगीन टोपी-कुर्ता) का मुख्य योगदान था।

 

Question 7. लेखक अपने संगी-साथियों के साथ निम्नलिखित में से कौन-सा नाटक नहीं खेलते थे?
(a) दुकानदार तथा खरीदार का नाटक
(b) घरौंदा और भोज का नाटक
(c) बरात और खेती का नाटक
(d) मेला जाने का नाटक
Answer: (d) मेला जाने का नाटक
In simple words: बच्चे आपस में मिलकर दुकान, शादी-बारात, खेती और दावत के खेल तो खेलते थे, परंतु मेला जाने का खेल नहीं खेलते थे।

Exam Tip: चूँकि विकल्प (a), (b) और (c) तीनों ही खेलों का पाठ में सजीव वर्णन है, अतः 'कौन-सा नाटक नहीं खेलते थे' का सही उत्तर 'मेला जाने का नाटक' होगा।

 

Question 8. गुरु जी ने गिरफ़्तारी वारंट लेकर पाठशाला से चार लड़कों को क्यों भेजा?
(a) लेखक तथा बैजू के पाठशाला नियमित न आने की शिकायत मिलने के कारण
(b) पाठशाला में मूसन तिवारी द्वारा शिकायत किए जाने के कारण
(c) पाठशाला से भाग जाने के कारण
(d) इनमें से कोई नहीं
Answer: (b) पाठशाला में मूसन तिवारी द्वारा शिकायत किए जाने के कारण
In simple words: जब बैजू और भोलानाथ ने मूसन तिवारी को चिढ़ाया, तो तिवारी जी ने स्कूल में शिकायत कर दी, जिसके बाद गुरु जी ने उन्हें पकड़ने के लिए लड़के भेजे।

Exam Tip: मूसन तिवारी की शिकायत ही गुरु जी द्वारा 'वारंट' (पकड़ने के आदेश) जारी करने का मुख्य कारण बनी थी।

 

Question 9. बिल से बाहर साँप क्यों निकल आया?
(a) बच्चों द्वारा बिल में पत्थर डालने के कारण
(b) बच्चों द्वारा बिल में पानी डालने के कारण
(c) शिकार की तलाश में
(d) गणेश जी के चूहे की रक्षा के लिए
Answer: (b) बच्चों द्वारा बिल में पानी डालने के कारण
In simple words: बच्चे जब टीले पर चूहे के बिल में नीचे से पानी डाल रहे थे, तो चूहे की जगह वहाँ छिपा हुआ साँप बाहर आ गया।

Exam Tip: चूहे के बिल में 'पानी उलीचना' (पानी डालना) ही साँप के बाहर निकलने का कारण था, पत्थर डालना नहीं।

 

Question 10. लेखक को अपने आँचल में डर से काँपता देखकर उसकी माँ ने क्या किया?
(a) वह ज़ोर से रोने लगी
(b) उसने सारा काम छोड़ दिया
(c) घबराकर भय का कारण पूछने लगी
(d) उपर्युक्त सभी
Answer: (d) उपर्युक्त सभी
In simple words: बेटे को डर से काँपते देख माँ घबरा गई, सारा काम छोड़ दिया, रोने लगी और प्यार से उसके घावों पर हल्दी लगाने लगी।

Exam Tip: माँ के वात्सल्य और व्याकुलता के इन सभी रूपों (रोने लगना, काम छोड़ना, घबराहट) को ध्यान में रखकर 'उपर्युक्त सभी' विकल्प का चयन करें।

 

II. पाठ आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न (3 अंक)

 

प्रश्न 1. लेखक के पिता जी लेखक को पूजा में अपने साथ क्यों बैठाते थे?
Answer: बाबू जी द्वारा अपने नन्हें पुत्र भोलानाथ को दैनिक पूजा-पाठ में अपने समीप बैठाने के पीछे कई गहरे आत्मीय कारण थे:
- वे अपने बेटे से अत्यधिक प्रेम करते थे और उसे पल भर के लिए भी खुद से दूर नहीं करना चाहते थे।
- बाबू जी स्वयं अत्यंत धार्मिक और आस्तिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। वे चाहते थे कि बचपन से ही उनके पुत्र में भी ईश्वर के प्रति आस्था, अच्छे संस्कार और सात्विक धार्मिक विचार जाग्रत हो सकें।
- वे मानते थे कि पूजा में साथ बैठने से बालक पर ईश्वर की असीम कृपा और आशीर्वाद हमेशा बना रहेगा।
In simple words: बाबू जी अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे और चाहते थे कि बचपन से ही उसमें अच्छे संस्कार, भगवान के प्रति आस्था और पूजा करने की आदत विकसित हो सके।

Exam Tip: पिता के 'असीम प्रेम' और पुत्र को 'धार्मिक व संस्कारी' बनाने के उनके पावन उद्देश्य को उत्तर के रूप में लिखें।

 

प्रश्न 2. शिशु का नाम भोलानाथ कैसे पड़ा?
Answer: लेखक का वास्तविक और नामकरण संस्कार का नाम 'तारकेश्वरनाथ' था। परंतु, उनके पिता बाबू जी भगवान शिव (भोलेनाथ) के परम भक्त थे। जब वे सुबह पूजा-पाठ करते थे, तो तारकेश्वरनाथ के माथे पर भभूत का बड़ा सा त्रिपुंड (तिलक) लगा देते थे। बालक के सिर पर लंबे-लंबे घने बाल थे, जिससे भभूत लगाने के बाद उनका स्वरूप हुबहू भगवान शिव के बाल रूप जैसा दिखाई देने लगता था। इसी दिव्य रूप को देखकर बाबू जी उन्हें लाड से 'भोलानाथ' कहकर बुलाने लगे और धीरे-धीरे उनका यही नाम लोक-प्रसिद्ध हो गया।
In simple words: लेखक का असली नाम तारकेश्वरनाथ था, परंतु उनके पिता पूजा के समय उनके माथे पर भभूत लगाते थे, जिससे वे शिव जी की तरह लगते थे, इसलिए बाबू जी उन्हें प्यार से 'भोलानाथ' बुलाने लगे।

Exam Tip: वास्तविक नाम 'तारकेश्वरनाथ', पिता की शिव-भक्ति और माथे पर लगाए जाने वाले 'भभूत के त्रिपुंड' के प्रसंग को उत्तर में अवश्य शामिल करें।

 

प्रश्न 3. भोलानाथ पूजा-पाठ में पिता जी के पास बैठा क्या करता रहता था?
Answer: जब बाबू जी शांत मन से रामायण का पाठ और अपनी दैनिक पूजा-अर्चना करते थे, तब बालक भोलानाथ उनके ठीक बगल में बैठ जाते थे। वे वहाँ रखे एक छोटे से दर्पण (आईने) में अपने चेहरे की बनावट को निहारते रहते थे और खुश होते थे। जब बाबू जी रामायण पढ़ते-पढ़ते अचानक भोलानाथ की ओर देखने लगते, तो बालक लजाकर और मंद-मंद मुस्कुराकर दर्पण को चुपके से नीचे रख देता था। अपने पुत्र की इस बाल-सुलभ क्रीड़ा को देखकर बाबू जी भी बहुत प्रसन्न होते थे और मुस्कुरा उठते थे।
In simple words: जब बाबू जी रामायण पढ़ते थे, तो भोलानाथ उनके पास बैठकर शीशे में अपना मुँह देखते थे और बाबू जी के देखने पर शरमाकर शीशा नीचे रख देते थे।

Exam Tip: उत्तर में बालक द्वारा 'आईने में मुँह निहारना' और पिता के देखने पर 'शर्माकर आईना नीचे रख देना' - इन दोनों क्रियाओं का सुंदर चित्रण करें।

 

प्रश्न 4. भोलानाथ के पिता जी की पूजा के कौन-कौन से अंग थे?
Answer: भोलानाथ के पिता जी की दैनिक पूजा अत्यंत व्यवस्थित, पवित्र और निम्नलिखित चार अंगों में विभाजित थी:
(i) स्नान आदि से निवृत्त होकर भगवान शिव की विधिवत पूजा-अर्चना करना और माथे पर भभूत लगाना। [37]
(ii) पवित्र मन से रामायण का पाठ करना। [37]
(iii) पूजा के बाद अपनी विशेष 'रामनामा बही' पर लाल स्याही से एक हज़ार बार 'राम-राम' लिखना। [37]
(iv) कागज़ के छोटे-छोटे टुकड़ों पर पाँच सौ बार 'राम-राम' लिखकर उन्हें आटे की गोलियों में लपेटना और गंगा किनारे जाकर उन गोलियों को मछलियों को खिलाना। [37]
In simple words: बाबू जी की पूजा में शिव जी का पूजन, रामायण का पाठ, रामनामा बही पर राम-राम लिखना और गंगा किनारे जाकर मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाना शामिल था। [37]

Exam Tip: बाबू जी की धार्मिक दिनचर्या के इन चारों अंगों (पूजन, पाठ, रामनामा बही लेखन, और मछलियों को आटा खिलाना) को परीक्षा में स्पष्ट रूप से लिखें।

 

प्रश्न 5. भोलानाथ माँ के साथ कितना नाता रखता था? वह अपने माता-पिता को क्या कहकर संबोधित करता था?
Answer: भोलानाथ का अपनी माता (मैया) के साथ मुख्य रूप से केवल दूध पीने तक का ही शारीरिक संबंध था। इसके अतिरिक्त, वे अधिकांश समय अपने पिता के साथ ही बिताते थे। मैया के पास वे केवल तब जाते थे जब मैया ज़बरदस्ती उन्हें पकड़कर उनके बालों में कड़वा तेल लगाती थी या उनका श्रृंगार करती थी, जो कि भोलानाथ को कतई पसंद नहीं था। वे रोते-सिसकते हुए मैया के पास से भाग आते थे। भोलानाथ अपनी माता को आदर से 'मइयाँ' या 'मैया' और अपने पिता को 'बाबू जी' कहकर संबोधित करते थे।
In simple words: भोलानाथ का माँ से संबंध केवल दूध पीने तक था, वे ज़्यादातर पिता के साथ रहते थे। वे अपनी माँ को 'मइयाँ' और पिता को 'बाबू जी' कहते थे।

Exam Tip: उत्तर में उनके माता के साथ संबंध (दूध पीने तक सीमित) और माता-पिता के लिए प्रयुक्त आदरसूचक शब्दों ('मइयाँ' और 'बाबू जी') का स्पष्ट उल्लेख करें।

 

प्रश्न 6. भोलानाथ के गोरस-भात खा चुकने के बाद माता और खिलाती थी, क्यों?
Answer: जब बाबू जी भोलानाथ को दूध और भात (गोरस-भात) मिलाकर छोटे-छोटे निवाले खिलाकर तृप्त कर देते थे, तब भी मैया का ममतामयी मन संतुष्ट नहीं होता था। उसका मानना था कि पुरुष बच्चों को खिलाने का सही तरीका नहीं जानते; वे छोटे निवाले देते हैं जिससे बच्चे का पेट बिना भरे ही वह खाना बंद कर देता है। मैया कहती थी कि जब तक बच्चे को 'भर-मुँह कौर' (बड़े निवाले) न खिलाए जाएँ, तब तक उसका पेट नहीं भरता। इसलिए वह स्वयं पक्षियों (तोता, मैना, कबूतर) के नाम के बड़े-बड़े कौर बनाकर प्यार से उसे पूरा भोजन खिलाती थी।
In simple words: माँ का मानना था कि पिता छोटे निवाले खिलाते हैं जिससे बच्चे का पेट नहीं भरता। इसलिए वे खुद पक्षियों के नाम के बड़े-बड़े निवाले बनाकर उसे पूरा खाना खिलाती थीं।

Exam Tip: माँ के ममतामयी दृष्टिकोण 'महतारी के हाथ से खाने पर ही पेट भरता है' और 'पक्षियों के नाम के कौर' बनाकर खिलाने के प्रसंग को उत्तर में स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 7. भोलानाथ भयभीत होकर बाग से क्यों भागा?
Answer: भोलानाथ अपनी बाल-मंडली के साथ आम के बगीचे में खेल रहे थे। अचानक तेज़ आंधी आई और फिर मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बच्चे पेड़ों की आड़ में खड़े हो गए। जैसे ही बारिश थमी, बगीचे की गीली मिट्टी और पत्तों के नीचे से कई भयानक बिच्छू बाहर निकल आए। इतने सारे बिच्छुओं को एक साथ देखकर बच्चे बुरी तरह डर गए। इसी डर और भय के कारण भोलानाथ और उनके सभी साथी चीखते-चिल्लाते हुए बगीचे से अपने-अपने घरों की ओर भाग खड़े हुए।
In simple words: बारिश रुकते ही आम के बगीचे में बहुत सारे बिच्छू निकल आए, जिससे डरकर भोलानाथ और उनके दोस्त भाग खड़े हुए।

Exam Tip: उत्तर में मूसलाधार बारिश के थमने और उसके तुरंत बाद 'बिच्छुओं के निकलने' को भागने का मुख्य कारण बताएं।

 

प्रश्न 8. भोलानाथ को सिसकते हुए देख माँ का स्नेह फूट पड़ा। कैसे?
Answer: जब भोलानाथ साँप के डर से बुरी तरह काँपते, रोते और सिसकते हुए घर के भीतर आए और अपनी माँ की गोद में छिप गए, तो बेटे की यह दयनीय दशा देखकर माँ का हृदय दहल उठा। वह वात्सल्य और ममता के वशीभूत होकर स्वयं भी ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसने अपना सारा काम बीच में ही छोड़ दिया और व्याकुल होकर भोलानाथ को गले से लगा लिया। वह उनके काँपते अंगों को अपने आँचल से पोंछती, चूमती और बार-बार उनका हाल-चाल पूछती थी। उसने तुरंत हल्दी पीसकर उनके छिले हुए घावों पर लगाई और बड़े लाड-प्यार से उन्हें सुलाने का प्रयास किया।
In simple words: बेटे को डर से काँपते देख माँ का वात्सल्य उमड़ पड़ा; वह खुद रोने लगी, सारा काम छोड़ दिया, घावों पर हल्दी लगाई और प्यार से चूमकर उसे गले लगा लिया।

Exam Tip: बेटे की विकलता पर माँ की व्याकुलता (काम छोड़ना, रो पड़ना, घावों पर हल्दी लगाना, चूमना) को उत्तर का मुख्य अंश बनाएँ।

 

प्रश्न 9. भयप्रकंपित भोलानाथ का चित्रण कीजिए।
Answer: साँप के अचानक सामने आ जाने से बालक भोलानाथ बुरी तरह भयभीत और आतंकित हो गए थे। उनका पूरा शरीर डर के मारे थर-थर काँप रहा था। डर के कारण उनकी आँखें खुलना चाहती थीं, परंतु पलकें भारी होकर बंद हो रही थीं। उनके होंठ काँप रहे थे और वे केवल 'साँ-साँ' (घबराहट की आवाज़) कर पा रहे थे। भागते समय गिरने के कारण उनका सारा शरीर धूल और काँटों से छिल गया था तथा पैरों के तलवे लहूलुहान हो गए थे। वे इतने डरे थे कि उन्होंने अपने बाबू जी की पुकार भी अनसुनी कर दी और केवल अपनी मइयाँ के आँचल की छाँह में छिपकर अपनी जान बचाना चाहते थे।
In simple words: साँप के डर से भोलानाथ का पूरा शरीर काँप रहा था, उनके पैर लहूलुहान थे, आँखें डर के मारे खुल नहीं रही थीं और वे रोते हुए केवल मैया के आँचल में छिप रहे थे।

Exam Tip: उनके शारीरिक डर (काँपना, रोंगटे खड़े होना, आँखें न खुलना) और उनके मानसिक डर (बाबू जी को अनदेखा कर मैया के आँचल में छिपना) का सजीव चित्रण करें।

 

प्रश्न 10. लेखक किस घटना को याद कर कहता है कि वैसा घोड़मुँहा आदमी हमने कभी नहीं देखा?
Answer: लेखक अपने बचपन की एक शरारत भरी घटना को याद करते हुए बताते हैं कि जब वे अपने साथियों के साथ सड़क पर किसी दूल्हे की बारात और उसकी पालकी को जाते हुए देखते थे, तो वे ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाते थे - "रहड़ी में रहड़ी पुरान रहड़ी, डोला के कनिया हमार मेहरी!" एक बार ऐसा चिल्लाने पर पालकी में बैठे एक खूसट और वृद्ध दूल्हे ने बड़ी दूर तक दौड़कर बच्चों को पत्थरों से मारा था। उस बूढ़े दूल्हे का अजीब, झुर्रीदार और घोड़े जैसा दिखने वाला बदसूरत चेहरा लेखक को आज भी याद है, जिसे वे मज़ाक में 'घोड़मुँहा आदमी' कहते हैं।
In simple words: बचपन में बारात देखकर चिढ़ाने पर एक बूढ़े दूल्हे ने बच्चों को पत्थरों से मारा था, उसी बूढ़े दूल्हे के घोड़े जैसे बदसूरत चेहरे को याद करके लेखक ने ऐसा कहा है।

Exam Tip: बारात के समय गाए जाने वाले चिढ़ाने वाले गीत ("रहड़ी में रहड़ी...") और वृद्ध दूल्हे द्वारा ढेलों से मारे जाने के प्रसंग को उत्तर में लिखें।

 

प्रश्न 11. मूसन तिवारी ने बच्चों को क्यों खदेड़ा?
Answer: आम के बगीचे से भागते समय रास्ते में बच्चों को उनके गाँव के एक बुजुर्ग मूसन तिवारी मिले। बाल-मंडली में शामिल एक बहुत ही ढीठ और शरारती लड़का 'बैजू' था। उसने तिवारी जी को अकेला देखकर चिढ़ाना शुरू कर दिया - "बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा!" बैजू को देखकर भोलानाथ और बाकी सभी बच्चों ने भी इसी सुर में चिल्लाना शुरू कर दिया। इस अपमानजनक शरारत से अत्यधिक क्रोधित होकर मूसन तिवारी ने लाठी तानकर बच्चों को मारने के लिए उनके पीछे दौड़ लगाई और उन्हें दूर तक खदेड़ा।
In simple words: शरारती बैजू और बच्चों ने मूसन तिवारी जी को "बुढ़वा बेईमान माँगे करैला का चोखा" कहकर चिढ़ाया था, जिससे गुस्सा होकर उन्होंने बच्चों को खदेड़ा।

Exam Tip: चिढ़ाने वाले वाक्य ("बुढ़वा बेईमान...") और बैजू की ढिठाई को मूसन तिवारी के क्रोध का मुख्य कारण बताएं।

 

प्रश्न 12. गुरु जी ने भोलानाथ की खबर क्यों ली?
Answer: जब मूसन तिवारी बच्चों की शरारत से तंग आ गए, तो वे सीधे स्कूल (पाठशाला) पहुँचे और गुरु जी से बच्चों की इस उद्दंडता की शिकायत कर दी। शिकायत सुनते ही गुरु जी बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने तुरंत पाठशाला से चार मज़बूत लड़कों को गिरफ़्तारी वारंट देकर भेजा ताकि वे बैजू और भोलानाथ को पकड़कर ला सकें। बैजू तो तेज़ी से भाग खड़ा हुआ, परंतु सीधे-सादे भोलानाथ पकड़े गए। गुरु जी ने इसी शरारत की सज़ा देने के लिए भोलानाथ की जमकर पिटाई की और उनकी खबर ली।
In simple words: मूसन तिवारी की शिकायत पर गुरु जी ने भोलानाथ को स्कूल पकड़वाया और बैजू के भाग जाने के कारण अकेले भोलानाथ की जमकर पिटाई की।

Exam Tip: मूसन तिवारी की स्कूल में शिकायत और बैजू के भाग जाने के कारण भोलानाथ का अकेले सज़ा पाने के प्रसंग को स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 13. गुरु जी की फटकार से रोता हुआ बालक भोलानाथ यकायक कैसे चुप हो गया?
Answer: पाठशाला में गुरु जी की मार खाने के बाद भोलानाथ बहुत ज़ोर-ज़ोर से रो रहे थे। जब बाबू जी उन्हें रोता हुआ घर ले जा रहे थे, तो रास्ते में अचानक उन्हें अपने हमउम्र बच्चों का एक बड़ा झुंड दिखाई दिया। वे सभी बच्चे मक्के के खेत के पास खड़े होकर पूरी मस्ती में नाच रहे थे और ज़ोर-ज़ोर से गा रहे थे - "माई पकाई गरर-गरर पूआ, हम खाइब पूआ ना खेलब जुआ!" अपने साथियों को इस तरह मस्ती में गाते और नाचते देख भोलानाथ का बाल-मन मचल उठा। वे अपना सारा दर्द और रोना भूल गए और तुरंत बाबू जी की गोद से उतरकर साथियों की मंडली में शामिल हो गए और खिलखिलाने लगे।
In simple words: रास्ते में अपने दोस्तों की टोली को गाते-नाचते देखकर भोलानाथ अपना सारा दुख भूल गए और बाबू जी की गोद से उतरकर उनके साथ खेलने लगे।

Exam Tip: बाल-मन की चंचलता और साथियों को देखकर 'रोना भूल जाने' की स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति को उत्तर का आधार बनाएँ।

 

प्रश्न 14. बाबू जी और गाँव के लोगों ने ऐसा क्यों कहा कि लड़के और बंदर सचमुच पराई पीर नहीं समझते?
Answer: जब बच्चों की टोली मक्के के खेत में घुसकर वहाँ दाना चुग रही चिड़ियों के झुंड को बिना किसी दया के केवल मज़ाक और मनोरंजन के लिए दौड़ा-दौड़ा कर पकड़ने लगी, तो चिड़ियाँ डर के मारे उड़ने लगीं। इस दृश्य को देखकर बाबू जी और गाँव के लोग खड़े होकर हँस रहे थे। उन्हें लगा कि बच्चे बिना किसी समझ के बेज़ुबान पक्षियों को केवल अपने खेलने का साधन मान रहे हैं और उनके डर व पीड़ा (पीर) को नहीं समझ रहे हैं। इसी बाल-सुलभ निष्ठुरता को देखकर उन्होंने कहा कि लड़के और बंदर दूसरों का दुःख नहीं समझते।
In simple words: बच्चे जब मक्के के खेत में चिड़ियों को केवल अपने मज़ाक के लिए उड़ा रहे थे और उनके डर को नहीं समझ रहे थे, तब गाँव वालों ने ऐसा कहा।

Exam Tip: चिड़ियों को पकड़ने के बच्चों के निष्ठुर खेल और 'पराई पीर' (दूसरों के दुःख) को न समझने की उनकी नासमझी को उत्तर में स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 15. पाठ के आधार पर ‘बाल-स्वभाव’ का वर्णन कीजिए।
Answer: 'माता का अँचल' पाठ के आधार पर बाल-स्वभाव की निम्नलिखित मुख्य विशेषताएं प्रकट होती हैं:
- **क्षणभंगुर दुःख:** बच्चों के मन में कोई भी दुःख, भय या पीड़ा स्थायी नहीं होती। वे थोड़ी देर पहले चाहे जितना रो रहे हों, अपने साथियों या पसंदीदा खेल को देखते ही वे तुरंत सब कुछ भूलकर हँसने लगते हैं।
- **खेल-प्रियता:** खेल ही बच्चों का सर्वस्व होता है। वे मिट्टी, पत्थरों और सूखी लकड़ियों जैसी साधारण चीज़ों से भी अपनी एक सुंदर और कल्पनाशील दुनिया रच लेते हैं।
- **निश्चलता और निश्छलता:** बाल-मन पूरी तरह पवित्र, निश्छल और द्वंद्व-रहित होता है। वे केवल स्नेह और वात्सल्य की भाषा समझते हैं और संकट के समय अपनी माँ की गोद को ही सबसे सुरक्षित स्थान मानते हैं।
In simple words: बाल-स्वभाव बहुत ही चंचल और सच्चा होता है; बच्चे अपना दुःख बहुत जल्दी भूल जाते हैं, मिट्टी-पत्थरों से भी खेल की दुनिया बना लेते हैं और अपनी माँ की गोद को सबसे सुरक्षित मानते हैं।

Exam Tip: बच्चों के चरित्र के प्रमुख गुणों (दुःख का स्थायी न होना, खेल-प्रियता, और निश्छल मन) को उदाहरणों सहित लिखें।

 

प्रश्न 16. ‘माता का अँचल’ पाठ में माता-पिता का बच्चे के प्रति जो वात्सल्य प्रकट हुआ है, उससे बच्चे में किन-किन गुणों का विकास होगा?
Answer: पाठ में माता-पिता द्वारा भोलानाथ पर बरसाए गए निस्वार्थ और अनन्य वात्सल्य से बालक के भीतर निम्नलिखित अत्यंत महत्वपूर्ण मानवीय गुणों का विकास होगा:
(i) **पारिवारिक जुड़ाव और सुरक्षा की भावना:** माता-पिता के इस गहरे प्रेम से बच्चे में परिवार के प्रति एक अटूट विश्वास और भावनात्मक सुरक्षा की भावना जाग्रत होगी, जो उसे जीवन में निडर बनाएगी। [39]
(ii) **सहानुभूति और संवेदनशीलता:** माता-पिता के आत्मीय आचरण से बालक दूसरों के दुखों को समझना सीखेगा और उसके भीतर दया, करुणा तथा संवेदनशीलता जैसे सकारात्मक जीवन मूल्यों का विकास होगा। [39]
(iii) **आत्मविश्वास और सामूहिकता:** पिता द्वारा खेलों में शामिल होने से बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है, जिससे वह समाज में सक्रिय रूप से भाग लेने और सबके साथ मिल-जुलकर रहने की सामूहिकता की भावना सीखता है। [39]
(iv) **व्यापक दृष्टिकोण:** माता-पिता का वात्सल्य बच्चे के संकुचित विचारों को समाप्त करके उसे एक परोपकारी और विशाल व्यक्तित्व प्रदान करता है। [39]
In simple words: माता-पिता के इस गहरे प्यार से बच्चे में आत्मविश्वास, पारिवारिक आत्मीयता, दूसरों के प्रति दया-करुणा, और समाज के साथ मिल-जुलकर रहने के अच्छे गुणों का विकास होता है। [39]

Exam Tip: माता-पिता के वात्सल्य से होने वाले चार प्रमुख विकासों (पारिवारिक जुड़ाव, संवेदनशीलता, आत्मविश्वास, और सामूहिकता) को स्पष्ट बिंदुओं में लिखें।

 

प्रश्न 17. बाबू जी पूजा-पाठ के बाद भोलानाथ को गंगा तक ले जाते तथा कई कामों में अपने साथ रखते। ‘माता का अँचल’ पाठ के आधार पर बताइए कि इससे भोलानाथ के किन-किन गुणों में प्रगाढ़ता आएगी?
Answer: बाबू जी द्वारा भोलानाथ को अपने साथ गंगा जी ले जाने, पूजा में बैठाने और पेड़ों पर झूला झुलाने जैसी गतिविधियों से भोलानाथ के व्यक्तित्व में निम्नलिखित गुणों का विकास होगा:
(i) **जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम:** गंगा में मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाने के संस्कार से बालक के भीतर मूक जीव-जंतुओं के प्रति दया, करुणा और स्नेह की भावना अत्यधिक सुदृढ़ होगी। [39]
(ii) **प्रकृति और पर्यावरण के प्रति आस्था:** नदियों (गंगा) के किनारे जाने और पेड़-पौधों की डालियों पर खेलने से उसके मन में प्रकृति के प्रति आदर, आस्था और उसके संरक्षण के प्रति जागरूकता का भाव पैदा होगा। [39]
(iii) **देश-प्रेम और संस्कृति का उदय:** अपनी मिट्टी, लोक-जीवन और गंगा जैसी पावन नदियों से जुड़कर बालक के मन में अपनी मातृभूमि और देश के प्रति गौरव की भावना का स्वतः उदय होगा। [39]
(iv) **पिता के साथ प्रगाढ़ संबंध:** पिता की छत्रछाया में रहने से उसका मानसिक विकास बहुत ही स्वस्थ और निडर रूप में होगा। [39]
In simple words: इससे भोलानाथ में पशु-पक्षियों के प्रति दया, प्रकृति और नदियों के प्रति आस्था, देश-प्रेम और अपने पिता के प्रति गहरा आदर विकसित होगा। [39]

Exam Tip: उत्तर में मुख्य रूप से 'जीव-दया', 'प्रकृति संरक्षण', और 'मातृभूमि के प्रति आदर' जैसे पर्यावरण और नैतिक मूल्यों को जोड़कर लिखें।

 

प्रश्न 18. ‘भोलानाथ और उसके साथियों के खेल, आज के खेल और खेल-सामग्री की अपेक्षा मूल्यों का विकास करने में अधिक समर्थ थे।’ ‘माता का अँचल’ पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
Answer: यह कथन पूरी तरह सत्य है। भोलानाथ और उनके साथियों के खेल आज के बंद कमरों में खेले जाने वाले मशीनी या कंप्यूटर खेलों की तुलना में मानवीय मूल्यों के विकास में कहीं अधिक समर्थ थे:
- **सामूहिकता और सामाजिकता:** भोलानाथ के खेल (जैसे दुकान सजाना, दावत करना, बारात निकालना) खुले मैदानों में साथियों के साथ मिलकर खेले जाते थे, जिससे बच्चों में आपसी तालमेल, सहयोग, भाईचारा, और गहरी मित्रता जैसे मूल्यों का विकास होता था। इसके विपरीत आज के बच्चे अकेले लूडो या वीडियो गेम खेलते हैं जिससे वे अंतर्मुखी हो जाते हैं। [39]
- **प्रकृति से जुड़ाव और रचनात्मकता:** उनके खेलों की सामग्रियाँ मिट्टी, पत्थर, सूखे पत्ते और फूटे घड़ों के टुकड़े जैसी प्राकृतिक चीज़ें होती थीं, जो बच्चों की कल्पनाशीलता और रचनात्मकता को बढ़ाती थीं। आज के प्लास्टिक और मशीनी खिलौने बच्चों को प्रकृति और रचनात्मकता से दूर कर देते हैं। [39]
In simple words: भोलानाथ के खेल प्राकृतिक चीज़ों से और दोस्तों के साथ खेले जाते थे जिससे उनमें मिल-जुलकर रहने, रचनात्मकता और प्रकृति से जुड़ने के अच्छे संस्कार विकसित होते थे, जो आज के अकेले वीडियो गेम खेलने से नहीं हो पाते। [39]

Exam Tip: प्राचीन ग्रामीण खेलों (सामूहिक, प्राकृतिक सामग्री) और आधुनिक शहरी खेलों (अकेले, मशीनी सामग्री) के अंतर को मूल्यों (सहयोग, रचनात्मकता) की दृष्टि से स्पष्ट करें।

 

प्रश्न 19. ‘माता का अँचल’ पाठ में वर्णित तत्कालीन विद्यालयों के अनुशासन से वर्तमान युग के विद्यालयों के अनुशासन की तुलना करते हुए बताइए कि आप किस अनुशासन व्यवस्था को अच्छा मानते हैं और क्यों?
Answer: 'माता का अँचल' पाठ में वर्णित तत्कालीन (पुराने समय के) स्कूलों का अनुशासन और वर्तमान युग के स्कूलों के अनुशासन में व्यापक अंतर दिखाई देता है:
- **तत्कालीन स्कूल व्यवस्था:** उस समय गुरु जी का विद्यालय में कड़ा भय और अनुशासन होता था। शरारत करने पर बच्चों को शारीरिक दंड (जैसे पिटाई होना) दिया जाता था, परंतु शिक्षकों और छात्रों के बीच एक अत्यंत आत्मीय और गहरा संबंध भी होता था, जहाँ बाबू जी के अनुरोध पर गुरु जी छात्र को माफ़ कर देते थे। [39]
- **वर्तमान स्कूल व्यवस्था:** आज के स्कूलों में शारीरिक दंड पर पूरी तरह रोक है, परंतु बच्चों के भीतर से शिक्षक और स्कूल का आदर व भय भी समाप्त होता जा रहा है, जिससे कई बार छात्र अनुशासनहीन और उच्छृंखल हो जाते हैं। [39]

**हमारा मत:** हम इन दोनों के संतुलित रूप को सबसे अच्छा मानते हैं। अनुशासन ऐसा होना चाहिए जिसमें शारीरिक दंड या हिंसा बिल्कुल न हो, परंतु छात्रों के मन में अपने शिक्षकों के प्रति गहरा आदर, सम्मान और अनुशासन का एक स्वस्थ भय अवश्य होना चाहिए, जिससे वे अच्छे नागरिक बन सकें। [39]
In simple words: पुराने समय में गुरु जी का डर था पर वे बच्चों से बहुत प्यार भी करते थे। आज सज़ा नहीं दी जाती पर बच्चों में अनुशासन की कमी दिखती है। हम एक ऐसी व्यवस्था को अच्छा मानते हैं जहाँ मार-पिटाई न हो, पर गुरु का आदर और अनुशासन बना रहे। [39]

Exam Tip: तत्कालीन स्कूलों की 'आत्मीयता व कड़े दंड' और वर्तमान स्कूलों की 'दंड-रहित स्वतंत्रता' के सकारात्मक व नकारात्मक पक्षों की निष्पक्ष तुलना करते हुए अपना संतुलित मत प्रस्तुत करें।

 

प्रश्न 20. भोलानाथ के पिता उसके साथ तरह-तरह की गतिविधियों में शामिल होते थे, पर आज माता-पिता अपने बच्चों के साथ ऐसा नहीं कर पाते हैं, क्यों? इससे बच्चे में कौन-कौन से गुण अविकसित रह जाते हैं?
Answer: आज के आधुनिक और महानगरीय जीवन में माता-पिता के पास समय का घोर अभाव है, जिसके कारण वे अपने बच्चों के साथ वैसा समय नहीं बिता पाते जैसा भोलानाथ के पिता बिताते थे:
- **समय का अभाव:** आज की बढ़ती आवश्यकताओं, कड़ी व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा और नौकरी की व्यस्तता के कारण माता-पिता कई-कई घंटे घर से बाहर काम करते हैं और थक जाते हैं। [39]
- **बच्चों में अविकसित रहने वाले गुण:** माता-पिता के साथ समय न बिता पाने के कारण बच्चों में सहनशीलता, बड़ों के प्रति आदर, मिल-जुलकर रहने की सामाजिक भावना, त्याग, संवेदनशीलता और परोपकार जैसे आवश्यक नैतिक और सामाजिक गुण पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते हैं और वे अकेलेपन के शिकार हो जाते हैं। [40]
In simple words: आज माता-पिता काम की व्यस्तता के कारण बच्चों को समय नहीं दे पाते। इससे बच्चों में मिल-जुलकर रहने की भावना, सहनशीलता, आदर और परोपकार जैसे अच्छे गुण विकसित नहीं हो पाते। [39, 40]

Exam Tip: उत्तर में आधुनिक जीवन की 'समय की कमी' की समस्या को बच्चों के 'नैतिक और सामाजिक विकास' में आने वाली रुकावटों से जोड़कर लिखें।

 

प्रश्न 21. भोलानाथ के पिता उसे लेकर गंगातट जाते और मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाते। उनके इस कार्य से भोलानाथ में किन-किन गुणों का विकास होता होगा?
Answer: बाबू जी द्वारा भोलानाथ को कंधे पर बैठाकर गंगा किनारे ले जाने और मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाने की इस पावन क्रिया से भोलानाथ के चरित्र में निम्नलिखित गुणों का विकास होगा:
- **जीव-दया और करुणा:** मूक जलीय जीवों (मछलियों) को भोजन खिलाने से बालक के मन में पशु-पक्षियों और जीवों के प्रति दया, सेवा और करुणा की भावना अत्यंत गहरी होगी। [40]
- **प्रकृति और पर्यावरण से जुड़ाव:** गंगा नदी के पवित्र तट पर जाने से उसके मन में हमारी प्राकृतिक संपदा और नदियों के प्रति गहरी आस्था व श्रद्धा जाग्रत होगी और वह उनके संरक्षण के प्रति सचेत बनेगा। [40]
- **पिता के प्रति आदर:** पिता के धार्मिक और दयालु आचरण को करीब से देखकर बालक के मन में अपने पिता के प्रति सम्मान बढ़ेगा और वह स्वयं भी एक संस्कारी व परोपकारी मनुष्य बनेगा। [40]
In simple words: इससे भोलानाथ में बेज़ुबान जीवों के प्रति दया, नदियों और पर्यावरण के प्रति आस्था, और अपने पिता के दयालु स्वभाव को अपनाकर अच्छे संस्कार सीखने की भावना बढ़ेगी। [40]

Exam Tip: जीव-दया, नदी संरक्षण, और पिता के अनुकरणीय आचरण के प्रभाव को उत्तर के मुख्य बिंदु बनाएँ।

 

प्रश्न 22. लेखक बचपन में मछलियों को आटे की गोलियाँ खाता देखकर खुश होता था, पर आज गंगा जैसी अनेक नदियों के प्रवाह में बदलाव आ गया है। आपके विचार से इस बदलाव का कारण क्या है? नदियों का स्वरूप पहले-सा बनाए रखने हेतु आप क्या-क्या सुझाव दे सकते हैं?
Answer: आज हमारी पावन नदियों (जैसे गंगा) के जल प्रवाह और उनके प्राचीन स्वरूप में जो भयानक और चिंताजनक बदलाव आया है, उसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं: [40]
- **बदलाव के कारण:** कल-कारखानों और फैक्ट्रियों का ज़हरीला रासायनिक कचरा सीधे नदियों में बहाना, शहरों के गंदे नालों का गंदा पानी नदियों में मिलना, प्लास्टिक की थैलियों व सूखे सड़े हुए पूजा अवशेषों को जल में प्रवाहित करना तथा जल का अंधाधुंध और गैर-जिम्मेदाराना दोहन करना। [40]

**नदियों को स्वच्छ रखने के सुझाव:**
1. फैक्ट्रियों के प्रदूषित जल को बिना साफ (ट्रीट) किए नदियों में बहने पर पूरी तरह कानूनी रोक लगाई जाए। [40]
2. नदियों में कूड़ा-कचरा, मूर्तियाँ या प्लास्टिक की थैलियाँ फेंकने वालों पर भारी जुर्माना लगाया जाए। [40]
3. समय-समय पर नदियों के जल की नियमित रूप से मशीनों द्वारा साफ़-सफ़ाई की जानी चाहिए। [40]
In simple words: आज फैक्ट्रियों के गंदे पानी और प्लास्टिक के कचरे के कारण नदियाँ गंदी हो गई हैं। इन्हें साफ़ रखने के लिए कचरा फेंकने पर रोक लगानी चाहिए और फैक्ट्रियों के गंदे पानी को साफ़ करके ही बाहर बहने देना चाहिए। [40]

Exam Tip: उत्तर में नदियों के प्रदूषण के मुख्य कारणों (औद्योगिक कचरा, प्लास्टिक) को स्पष्ट करते हुए उनके समाधान के लिए व्यावहारिक सुझाव दें।

 

प्रश्न 23. ‘माता का अँचल’ पाठ में ग्रामीण परिवेश का चित्रण किया गया है। आप ग्रामीण जीवन व शहरी जीवन में क्या अंतर पाते हैं?
Answer: 'माता का अँचल' पाठ के आधार पर ग्रामीण और शहरी जीवन के बीच निम्नलिखित मुख्य अंतर दिखाई देते हैं:
- **ग्रामीण जीवन:** यहाँ लोग प्रकृति के बहुत करीब होते हैं, चारों ओर खुली हरियाली होती है। लोगों के बीच गहरी आत्मीयता, भाईचारा और मिलकर रहने की भावना होती है, जहाँ बच्चे सामूहिक रूप से मिट्टी और पत्थरों से मज़ेदार खेल खेलते हैं। [40]
- **शहरी जीवन:** इसके विपरीत, शहरों में लोग कंक्रीट के बंद मकानों में एकाकी और कृत्रिम जीवन जीते हैं। वहाँ लोगों के बीच आत्मीयता और मेल-जोल की बहुत कमी होती है। बच्चे मैदानों में खेलने के बजाय फ्लैटों के भीतर वीडियो गेम या मोबाइल फोन में व्यस्त रहते हैं, जिससे वे प्रकृति के सौंदर्य से दूर हो जाते हैं। [40]
In simple words: गाँव में लोग प्रकृति के करीब और मिल-जुलकर प्यार से रहते हैं, जबकि शहर में लोग बंद मकानों में अकेले रहते हैं और बच्चे मोबाइल गेम्स में व्यस्त रहते हैं। [40]

Exam Tip: गाँव की 'प्राकृतिक सुंदरता व आत्मीयता' की तुलना शहर के 'एकाकी जीवन व कृत्रिमता' से करते हुए उत्तर लिखें।

 

अभ्यास प्रश्न पत्र

1. निम्नलिखित में से किन्हीं चार प्रश्नों के उत्तर दीजिए।

 

Question 1(क). ‘माता का अँचल’ पाठ का कोई एक ऐसा प्रसंग कारण सहित लिखिए जो आपके दिल को छू गया हो।
Answer: इस पाठ का सबसे मर्मस्पर्शी और दिल को छू लेने वाला प्रसंग कहानी का अंतिम दृश्य है, जब बालक भोलानाथ साँप के डर से बुरी तरह काँपता, रोता और सिसकता हुआ अपने घर भागता है। बरामदे में बैठे अपने प्रिय बाबू जी, जिनके साथ वे अपना सारा दिन बिताते थे, की पुकार को अनसुनी करके वे सीधे घर के भीतर अपनी मैया की गोद में जाकर छिप जाते हैं। मैया अपने बेटे की यह भयभीत दशा देखकर अत्यंत व्याकुल हो जाती है और अपना सारा काम छोड़कर उसे सीने से लगा लेती है तथा रोने लगती है। यह प्रसंग यह सिद्ध करता है कि बच्चे को दुनिया में सबसे अधिक परम शांति और सुरक्षा केवल अपनी माँ के आँचल की छाँह में ही मिलती है, जो माँ-बेटे के अनमोल और पवित्र प्रेम को दर्शाता है।
In simple words: इस पाठ का सबसे सुंदर प्रसंग अंत का है, जब साँप के डर से भोलानाथ अपने बाबू जी की पुकार अनसुनी करके सीधे अपनी माँ की गोद में छिप जाते हैं, जो यह दिखाता है कि माँ का आँचल ही दुनिया का सबसे सुरक्षित स्थान है।

Exam Tip: अंतिम प्रसंग (साँप का डर और माँ की गोद में शरण लेना) को उसकी भावनात्मक गहराई और मैया के वात्सल्य के साथ कारण सहित स्पष्ट करें।

 

Question 1(ख). ‘माता का अँचल’ पाठ में माता-पिता का बच्चों के प्रति जो भाव व्यक्त हुआ है, उसे अपने शब्दों में लिखिए।
Answer: इस पाठ में माता-पिता का अपने पुत्र भोलानाथ के प्रति अत्यंत पवित्र, निस्वार्थ और गहरा वात्सल्य (प्रेम) प्रकट हुआ है:
- **पिता का स्नेह:** बाबू जी भोलानाथ को सुबह अपने साथ जगाने, नहलाने, पूजा में अपने साथ बैठाने, गंगा किनारे ले जाने और उनके खेलों (जैसे दुकान, बारात, खेती) में एक बच्चे की तरह शामिल होकर उनका उत्साह बढ़ाते थे। उनका यह आचरण मित्रवत और वात्सल्य से भरा था।
- **माता का स्नेह:** मैया का प्रेम ममता की पराकाष्ठा है। वह बाबू जी द्वारा खिलाने के बाद भी स्वयं पक्षियों के नाम के बड़े-बड़े निवाले बनाकर लाड से खिलाती थी। संकट के समय जब बेटा काँपता हुआ आया, तो वह स्वयं रो पड़ी, घावों पर हल्दी लगाई और उसे चूमकर सीने से लगा लिया। माता-पिता का यह प्रेम बच्चे के संपूर्ण मानसिक विकास का आधार है।
In simple words: पिता मित्र की तरह भोलानाथ को अपने साथ पूजा कराते, गंगा ले जाते और उनके खेलों में शामिल होते थे, जबकि माँ का वात्सल्य अनोखा था जो प्यार से खाना खिलाती और मुसीबत में उसे अपने आँचल में छिपा लेती थी।

Exam Tip: उत्तर में पिता के मित्रवत स्नेह (खेलों व पूजा में शामिल होना) और माता के ममतामयी रक्षक रूप (कठिन समय में शरण देना) दोनों का सुंदर विवरण दें।

 

Question 1(ग). ‘माता का अँचल’ पाठ के आधार पर बताइए कि वर्तमान समय में बच्चों की खेल-सामग्रियों में किस-किस प्रकार के परिवर्तन आए हैं? इससे उनके मूल्यों पर किस प्रकार के प्रभाव देखने को मिलते हैं?
Answer: पाठ के समय (तत्कालीन ग्रामीण परिवेश) और वर्तमान समय में बच्चों की खेल-सामग्रियों और मूल्यों में निम्नलिखित बड़े बदलाव आए हैं:
- **खेल-सामग्रियों में परिवर्तन:** पुराने समय में बच्चे मिट्टी के ढेलों, पत्तों, फूटे घड़ों के टुकड़ों, लकड़ी के सरकंडों और कागज़ जैसी प्राकृतिक व अनुपयोगी चीज़ों से स्वयं खिलौने बनाकर खेलते थे। परंतु, आज के बच्चे महँगे प्लास्टिक के खिलौनों, रिमोट कंट्रोल कारों, कंप्यूटर गेम्स और मोबाइल फोन जैसी मशीनी सामग्रियों से खेलते हैं।
- **मूल्यों पर प्रभाव:** पुराने सामूहिक खेलों से बच्चों में आपसी सहयोग, सामूहिकता, गहरी मित्रता, रचनात्मकता और प्रकृति के प्रति प्रेम जैसे अच्छे मानवीय मूल्यों का विकास होता था। इसके विपरीत, आज के अकेले खेले जाने वाले डिजिटल खेलों से बच्चे आत्मकेंद्रित (स्वार्थी), एकाकी स्वभाव के, चिड़चिड़े और सामाजिक व्यवहार से दूर होते जा रहे हैं।
In simple words: पहले बच्चे मिट्टी-पत्थरों से दोस्तों के साथ मिलकर खेलते थे जिससे उनमें भाईचारा और रचनात्मकता बढ़ती थी, पर आज बच्चे अकेले मोबाइल गेम्स खेलते हैं जिससे वे अकेलेपन और चिड़चिड़ेपन का शिकार हो रहे हैं।

Exam Tip: खेल-सामग्रियों के भौतिक बदलाव (प्राकृतिक बनाम कृत्रिम) और बच्चों के मानसिक विकास पर उसके प्रभाव (सामाजिकता बनाम एकाकीपन) को तार्किक रूप से समझाएं।

 

Question 1(घ). भोलानाथ को उनके पिता जी अपने साथ पूजा में क्यों बैठाते थे?
Answer: बाबू जी भोलानाथ से अत्यधिक स्नेह करते थे और उसे अपने से दूर नहीं करना चाहते थे। वे स्वयं एक बहुत ही धार्मिक और आस्तिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, अतः वे चाहते थे कि बचपन से ही उनके नन्हें पुत्र में भी ईश्वर के प्रति आस्था, सात्विक विचार और अच्छे संस्कारों का उदय हो सके। वे मानते थे कि भगवान शिव (भोलेनाथ) की पूजा में साथ बैठने और मस्तक पर भभूत का त्रिपुंड लगाने से बालक पर हमेशा ईश्वर की विशेष अनुकंपा और आशीर्वाद बना रहेगा। यही कारण था कि वे पूजा में भोलानाथ को अपने बगल में बैठाते थे।
In simple words: बाबू जी अपने बेटे से बहुत प्यार करते थे और चाहते थे कि बचपन से ही उसमें अच्छे संस्कार, भगवान के प्रति आस्था और पूजा करने की आदत विकसित हो सके।

Exam Tip: पिता के 'असीम प्रेम' और पुत्र को 'धार्मिक व संस्कारी' बनाने के उनके पावन उद्देश्य को उत्तर के रूप में लिखें।

 

Question 1(ङ). आपके विचार से भोलानाथ अपने साथियों को देखकर रोना क्यों भूल जाता है?
Answer: हमारे विचार से, बाल-मन की यह अत्यंत स्वाभाविक और चंचल विशेषता होती है कि उनके लिए उनका मित्र-समूह और खेल ही सबसे प्रिय वस्तु होते हैं। जब भोलानाथ रोते या सिसकते हुए अपने पिता की गोद में बाहर आते थे, तो अपने सामने अपनी ही उम्र के बच्चों के झुंड को खेलते, नाचते और गाते हुए देखते थे। साथियों को देखकर उनके भीतर का बाल-सुलभ आकर्षण तुरंत जाग उठता था। वे अपने खेल की इच्छा और साथियों की टोली के आनंद में इतने डूब जाते थे कि वे अपना सारा दुःख, भय या रोने का कारण पल भर में भूल जाते थे और बाबू जी की गोद से उतरकर तुरंत उनके साथ खेलने लगते थे।
In simple words: बच्चों के लिए उनके दोस्तों की टोली और खेल सबसे प्यारे होते हैं। अपने साथियों को मस्ती में खेलते और गाते देखकर भोलानाथ का चंचल बाल-मन अपना सारा दुःख और रोना तुरंत भूल जाता था।

Exam Tip: बाल-मन की चंचलता, खेल के प्रति उनके असीम आकर्षण और साथियों की टोली (मित्र-मंडली) के प्रभाव को उत्तर का आधार बनाएँ।

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