NCERT Solutions Class 9 Hindi Ganga Chapter 07 मैं और मेरा देश

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Class 9 Hindi Ganga Chapter 07 मैं और मेरा देश NCERT Solutions PDF

Question 1. “एक दिन आनंद की इस दीवार में दरार पड़ गई”, इस पंक्ति में रेखांकित शब्द ‘दरार’ किस ओर संकेत करता है?
(क) पूर्णता के भाव की तुष्टि
(ख) पारस्परिक संबंध टूटने की स्थिति
(ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार
(घ) सुख-सुविधाओं का अभाव
Answer: (ग) पूर्णता के भाव पर प्रहार
इस पंक्ति में 'दरार' शब्द का आशय किसी भौतिक वस्तु के टूटने से नहीं है, बल्कि यह लेखक के मानसिक और वैचारिक चिंतन में आए एक बड़े बदलाव का प्रतीक है। पूर्व में लेखक स्वयं को अपने गृह, आस - पड़ोस और नगर की चारदीवारी के भीतर पूरी तरह संतुष्ट व सुखी अनुभव करते थे। किंतु जैसे ही उन्हें देश की पराधीनता के दंश और उससे जुड़े राष्ट्रीय तिरस्कार की अनुभूति हुई, वैसे ही उनके मन की वह संकीर्ण संतुष्टि टूटकर बिखर गई। अर्थात् उनके मन में व्याप्त 'पूर्णता की झूठी भावना' पर एक गहरा आघात लगा।
In simple words: यहाँ 'दरार' का अर्थ लेखक के मन की उस झूठी संतुष्टि का टूटना है, जो उन्हें देश की गुलामी का अहसास होने पर महसूस हुई।

Exam Tip: 'दरार' शब्द के लाक्षणिक अर्थ (राष्ट्रीय चेतना जाग्रत होने पर संकीर्ण व्यक्तिगत सुख का टूटना) को स्पष्ट रूप से समझाएं।

 

Question 2. निबंध में कहा गया है कि “ऐसे प्रश्नों का उत्तर देने में एक अपूर्व आनंद आता है।” लेखक को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद की अनुभूति होती है?
(क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
(ख) बात का निष्कर्ष प्रस्तुत करने वाले प्रश्नों का
(ग) बिना किसी संदर्भ के पूछे गए प्रश्नों का
(घ) किसी की समझ का आकलन करने वाले प्रश्नों का
Answer: (क) बात को विस्तार देने वाले प्रश्नों का
कवि का मानना है कि वे सवाल जो विचारों को एक नया विस्तार देते हैं और मन में छिपे चिंतन को गहराई से प्रकट करने का सुअवसर प्रदान करते हैं, उनके उत्तर देने में अत्यंत प्रसन्नता मिलती है। ऐसे प्रश्न किसी विषय को संकुचित करने के स्थान पर उसे चारों ओर फैलाने, नए दृष्टिकोण से देखने और विमर्श को आगे बढ़ाने में बहुत सहायक सिद्ध होते हैं। इसलिए लेखक को ऐसे रचनात्मक प्रश्नों के उत्तर देने में एक अनूठा संतोष मिलता है।
In simple words: लेखक को उन प्रश्नों के उत्तर देना बहुत पसंद है जो उनकी सोच को और आगे बढ़ने तथा अपनी बात को विस्तार से समझाने का मौका देते हैं।

Exam Tip: उत्तर में 'विचारों का विस्तार' और 'चिंतन को आगे बढ़ाना' जैसी विशेषताओं का स्पष्ट उल्लेख करें।

 

Question 3. “अपने महान राष्ट्र की पराधीनता के दीन दिनों में जिन लोगों ने अपने रक्त से गौरव के दीपक जलाए”, इस वाक्य में पराधीनता के दिनों को दीन कहा गया है क्योंकि पराधीन भारत में—
(क) भोजन, आवास और वस्त्र जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था।
(ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
(ग) महत्वपूर्ण निर्णय लेने की स्वतंत्रता थी।
(घ) धार्मिक रीति-रिवाजों को मनाने पर रोक लगाई जाती थी।
Answer: (ख) लोगों के आत्मसम्मान और गौरव की भावना का दमन होता था।
इस प्रसंग में 'दीन दिनों' का अभिप्राय केवल आर्थिक विपन्नता या भौतिक साधनों की कमी से नहीं है, अपितु यह उस समय की मानसिक लाचारी और राष्ट्रीय अपमान की दयनीय स्थिति को दर्शाता है। पराधीनता के दौर में व्यक्ति की सबसे बड़ी हानि उसके आत्मसम्मान, निज गौरव और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का छिन जाना होती है। लेखक स्पष्ट करना चाहते हैं कि बिना स्वतंत्रता के किसी भी व्यक्ति या राष्ट्र का स्वाभिमान जीवित नहीं रह सकता, और वह सदैव एक हीन अवस्था में ही जीवन जीने के लिए विवश रहता है।
In simple words: गुलामी के दिनों को 'दीन' इसलिए कहा गया है क्योंकि उस समय लोगों की आजादी, उनका आत्मसम्मान और देश का स्वाभिमान पूरी तरह कुचल दिया गया था।

Exam Tip: 'दीन' शब्द के लाक्षणिक अर्थ (आर्थिक गरीबी नहीं, अपितु राष्ट्रीय व मानसिक पराधीनता) को उत्तर में बिंदुवार ढंग से समझाएं।

 

Question 4. निबंध के अनुसार मनुष्य साधन-संपन्न होते हुए भी गौरव का अनुभव नहीं कर सकते यदि—
(क) उन्हें विदेश भ्रमण के अवसर न मिलें।
(ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
(ग) उनके नगर की शासन प्रणाली कमजोर हो।
(घ) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन होता हो।
Answer: (ख) उनका देश किसी दूसरे देश के अधीन हो।
लाला लाजपत राय जी के विदेशी यात्रा के अनुभवों से यह तथ्य भली - भाँति स्पष्ट होता है कि चाहे कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से कितना ही धनी, शिक्षित और साधन - संपन्न क्यों न हो, यदि उसका देश पराधीन है, तो उसे विदेशों में कभी भी सच्चा आदर और मान - सम्मान प्राप्त नहीं हो सकता। गुलामी का यह कलंक व्यक्ति के हर एक व्यक्तिगत गौरव पर पानी फेर देता है। अतः राष्ट्रीय स्वाधीनता के बिना व्यक्ति का निजी ऐश्वर्य और सुख - साधन भी सर्वथा निरर्थक और अपूर्ण प्रतीत होते हैं।
In simple words: यदि हमारा देश आजाद नहीं है, तो चाहे हम कितने भी अमीर या पढ़े - लिखे क्यों न हों, हमें दुनिया में कहीं भी सच्चा सम्मान और आदर नहीं मिल सकता।

Exam Tip: उत्तर में राष्ट्रीय स्वतंत्रता के महत्व को स्पष्ट करते हुए लाला लाजपत राय जी के जीवन प्रसंग का संक्षेप में उल्लेख करें।

 

Question 5. “पर उन दो घटनाओं में वह गाँठ इतनी साफ है”, इस वाक्य में रेखांकित शब्द ‘गाँठ’ किन दो बातों को साथ बाँधती है?
(क) देश और नागरिक
(ख) देश और संविधान
(ग) देश और विदेश
(घ) व्यवसाय और आजीविका
Answer: (क) देश और नागरिक
काव्य में प्रयुक्त 'गाँठ' शब्द उस अटूट और शाश्वत संबंध का प्रतीक है जो किसी भी देश को वहाँ के नागरिकों के आचरण और व्यवहार से दृढ़तापूर्वक जोड़ता है। लेखक दो घटनाओं के माध्यम से यह प्रतिपादित करते हैं कि किसी भी नागरिक का कोई भी छोटा या बड़ा कार्य सीधे तौर पर उसके राष्ट्र के गौरव को या तो बढ़ाता है या फिर उसे धूमिल करता है। नागरिक और उसका देश कभी पृथक नहीं हो सकते; वे दोनों एक - दूसरे से बहुत ही सूक्ष्मता और गहराई के साथ परस्पर बंधे हुए हैं।
In simple words: 'गाँठ' का अर्थ उस गहरे संबंध से है जो देश के मान - सम्मान को सीधे उसके नागरिकों के अच्छे या बुरे व्यवहार से जोड़कर रखता है।

Exam Tip: 'गाँठ' शब्द के लाक्षणिक अर्थ को नागरिक की व्यक्तिगत जिम्मेदारी और राष्ट्रीय अस्मिता के अंतर्संबंध के माध्यम से समझाएं।

 

Question 6. प्रस्तुत निबंध में मुख्यतः कौन-सा भाव व्यक्त हुआ है?
(क) लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था
(ख) पारिवारिक संबंधों का महत्व
(ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
(घ) देश का महत्व और व्यक्ति की उपेक्षा
Answer: (ग) व्यक्ति और देश का अंतर्संबंध
इस उत्कृष्ट वैचारिक निबंध का मूल संदेश व्यक्ति और उसके राष्ट्र के मध्य व्याप्त अत्यंत घनिष्ठ और अटूट रिश्ते को उजागर करना है। लेखक बार - बार इस महत्वपूर्ण तथ्य पर बल देते हैं कि किसी भी समाज के नागरिकों का दैनिक चरित्र, आचरण और नैतिक मूल्य ही अंततः उसके देश की वैश्विक छवि और मान - मर्यादा का निर्धारण करते हैं। राष्ट्र कोई अमूर्त भौगोलिक सीमा मात्र नहीं है, बल्कि उसके नागरिकों के सामूहिक व्यवहार का सजीव प्रतिबिंब होता है।
In simple words: इस निबंध का मुख्य भाव यह है कि एक नागरिक का हर काम सीधे तौर पर उसके देश के सम्मान और गरिमा को प्रभावित करता है।

Exam Tip: व्यक्ति की व्यक्तिगत मर्यादा और राष्ट्र की वैश्विक छवि के बीच के सीधे आनुपातिक संबंध को इस उत्तर का मुख्य आधार बनाएं।

 

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मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

 

Question 1. स्वामी रामतीर्थ फल देने वाले युवक का उत्तर सुनकर मुग्ध क्यों हो गए?
Answer: स्वामी रामतीर्थ उस साधारण जापानी युवक के अद्भुत आचरण और वचनों को सुनकर अत्यधिक विस्मित व गद्गद हो गए, क्योंकि उस बालक के व्यवहार में अपने राष्ट्र के प्रति निश्छल प्रेम और असीम जिम्मेदारी की पावन भावना झलक रही थी। उसने स्वामी जी से फलों का मूल्य लेने के बजाय उन्हें एक आदरणीय उपहार के रूप में वे फल भेंट कर दिए। इसके साथ ही, उसने अत्यंत विनम्रता से केवल यही प्रार्थना की कि वे अपने वतन लौटकर कभी यह न कहें कि जापान में उत्तम कोटि के फल नहीं मिलते।
यह साधारण सी घटना यह सिद्ध करती है कि वह युवक अपने राष्ट्र के सम्मान व वैश्विक छवि के प्रति कितना अधिक जागरूक व समर्पित था। उसने अपने निजी व्यावसायिक लाभ की तनिक भी परवाह न करते हुए देश के स्वाभिमान को सर्वोपरि स्थान दिया। उसकी इस निःस्वार्थ देशभक्ति, सजगता और राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाने के इस छोटे से परंतु महान प्रयास ने स्वामी जी के अंतःकरण को छू लिया, जिससे वे उस पर पूरी तरह मोहित हो गए।
In simple words: वह जापानी युवक अपने देश के सम्मान को लेकर बहुत सजग था। उसने पैसों के बजाय स्वामी जी से केवल यह वादा माँगा कि वे अपने देश जाकर जापान के फलों की बुराई न करें, जिससे स्वामी जी बहुत खुश हुए।

Exam Tip: युवक द्वारा व्यक्तिगत लाभ की बलि देकर 'राष्ट्रीय स्वाभिमान' को प्राथमिकता देने वाले मुख्य प्रसंग को उत्तर में रेखांकित करें।

 

Question 2. जापान के युवक ने स्वामी रामतीर्थ को दिए गए फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा? आपके मन में उस युवक के व्यक्तित्व की कौन-सी छवि उभरती है, यह भी लिखिए।
Answer: फलों के मूल्य के रूप में उस जापानी युवक ने स्वामी जी से किसी प्रकार के धन या भौतिक वस्तु की आकांक्षा नहीं की। उसने केवल यह आदरपूर्ण निवेदन किया कि स्वामी जी अपने देश वापस जाकर यह प्रचारित न करें कि जापान में स्वादिष्ट व अच्छे फलों का अभाव है। उसका एकमात्र ध्येय अपने राष्ट्र के स्वाभिमान और गरिमा की रक्षा करना था, न कि अपना निजी व्यापार बढ़ाना।
इस प्रसंग से हमारे मानस - पटल पर उस युवक की छवि एक अत्यंत सजग, निःस्वार्थ और परम राष्ट्रभक्त नागरिक के रूप में अंकित होती है। वह अपने देश की सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील था और एक छोटी सी व्यापारिक घटना को भी राष्ट्र की आन - बान - शान से जोड़कर देखता था। उसके इस व्यवहार में गहरी नम्रता, जिम्मेदारी और राष्ट्रीय आत्मसम्मान की भावना साफ दिखाई देती है। उसका यह अनुकरणीय चरित्र यह सिद्ध करता है कि वह केवल स्वार्थ की संकीर्ण सीमा में नहीं जीता था, बल्कि पूरे राष्ट्र की मर्यादा के प्रति जागरूक रहने वाला एक आदर्श नागरिक था।
In simple words: युवक ने पैसों के बदले केवल यह वादा माँगा कि स्वामी जी अपने देश जाकर जापान की निंदा न करें। इससे हमारे मन में उसकी छवि एक सच्चे, निस्वार्थ और देश से प्यार करने वाले नागरिक की बनती है।

Exam Tip: उत्तर को दो भागों में स्पष्ट रूप से बांटकर लिखें - पहले भाग में युवक द्वारा मांगे गए मूल्य (निवेदन) का उल्लेख करें और दूसरे भाग में उसके 'आदर्श नागरिक' वाले चरित्र का चित्रण करें।

 

Question 3. “बात यह है कि मैं और मेरा देश दो अलग चीज तो हैं ही नहीं।” स्वयं को देश से अलग न मानने के पीछे क्या तर्क हो सकते हैं, उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
Answer: लेखक के इस महत्वपूर्ण कथन का मूल दार्शनिक तर्क यह है कि देश का स्वरूप कोई जड़ भौगोलिक सीमा या नक्शा मात्र नहीं होता, बल्कि वह वहाँ रहने वाले नागरिकों की सामूहिक चेतना, उनके दैनिक कर्मों और आचरण से ही आकार ग्रहण करता है। एक नागरिक का हर एक व्यक्तिगत कदम अप्रत्यक्ष रूप से उसके राष्ट्र के स्वाभिमान को प्रभावित करता है। यदि हम अपने कर्तव्यों का पालन ईमानदारी से करेंगे, तो हमारा राष्ट्र विश्व पटल पर गौरवान्वित होगा; इसके विपरीत यदि हमारा आचरण अशोभनीय रहा, तो देश की मर्यादा कलंकित होगी।
उदाहरण स्वरूप, यदि कोई नागरिक पर्यटन स्थलों या ऐतिहासिक स्मारकों पर कूड़ा - करकट फेंकता है, तो विदेशी सैलानियों की दृष्टि में संपूर्ण राष्ट्र की छवि अस्वच्छ और असभ्य बन जाती है। वहीं, दूसरी ओर यदि कोई वैज्ञानिक नई खोज करता है, या कोई खिलाड़ी वैश्विक प्रतियोगिता में विजय पताका फहराता है, तो पूरे देश का मस्तक गर्व से ऊँचा हो जाता, जैसा कि उस छोटे से जापानी बालक ने अपनी सूझबूझ से किया था। अतः, नागरिक और देश का अस्तित्व एक - दूसरे से इतने गहरे जुड़े हैं कि उन्हें कभी भी पृथक करके नहीं देखा जा सकता।
In simple words: देश कोई अलग से दिखने वाली वस्तु नहीं है, वह हम सब नागरिकों से मिलकर ही बना है। हमारा हर अच्छा काम देश का मान बढ़ाता है और हर बुरा काम देश को अपमानित करता है।

Exam Tip: व्यक्तिगत आचरण (जैसे स्वच्छता या अनुशासन) और राष्ट्रीय छवि के सीधे संबंधों को उपयुक्त उदाहरणों (जैसे खेल या विज्ञान) के माध्यम से सिद्ध करें।

 

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मेरे अनुभव मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

 

Question 1. “देश की हीनता और गौरव का ही फल उसे नहीं मिलता, उसकी हीनता और गौरव का फल भी उसके देश को मिलता है”, अपने आस-पास के विभिन्न उदाहरणों के द्वारा इस पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
Answer: इस सारगर्भित पंक्ति का मूल भाव यह है कि व्यक्ति और समाज के हित आपस में इस प्रकार अंतर्ग्रथित हैं कि उनके परिणाम परस्पर एक - दूसरे को प्रभावित करते हैं। एक सामान्य नागरिक के आचरण का फल राष्ट्र को भुगतना पड़ता है, और देश के गौरव या अपमान का सीधा असर हर एक नागरिक के सामाजिक जीवन पर पड़ता है। दोनों ही एक - दूसरे के मान और अपमान के बराबर के हिस्सेदार हैं।
इसे हम अपने दैनिक जीवन के सरल उदाहरणों से समझ सकते हैं। यदि कोई छात्र अपने विद्यालय में अनुशासन भंग करता है, तो इससे न केवल उसका व्यक्तिगत नुकसान होता है, बल्कि उसके पूरे परिवार और स्कूल के मान - सम्मान पर भी धब्बा लगता है। इसी प्रकार, जब कोई रेल या बस का यात्री नियमों की अनदेखी कर गंदगी फैलाता है या अनैतिक कार्य करता है, तो विदेशी पर्यटकों के सामने हमारे पूरे देश की छवि धूमिल हो जाती है।
इसके विपरीत, जब हमारे देश का कोई युवा वैज्ञानिक किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी नई खोज प्रस्तुत करता है, या कोई एथलीट ओलंपिक खेलों में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतता है, तो उसकी इस व्यक्तिगत सफलता से संपूर्ण भारतवर्ष का मस्तक वैश्विक स्तर पर गर्व से ऊँचा हो जाता है। अतः, देश का गौरव नागरिकों से है और नागरिकों का मान उनके स्वतंत्र और समृद्ध देश से है।
In simple words: इस पंक्ति का अर्थ है कि नागरिक का अच्छा या बुरा व्यवहार सीधे उसके देश के नाम को प्रभावित करता, और देश की अच्छी या बुरी स्थिति का प्रभाव वहाँ के नागरिकों के सम्मान पर पड़ता है।

Exam Tip: इस उत्तर में विद्यालयी अनुशासन और राष्ट्रीय स्तर के खेल/वैज्ञानिक उपलब्धियों जैसे दोनों पक्षों (सकारात्मक और नकारात्मक) के उदाहरण देकर बात को पुष्ट करें।

 

Question 2. (क) प्रात:काल से लेकर रात्रि तक आप अपने किन-किन कार्यों में किस-किसका क्या सहयोग लेते हैं और आप दूसरों को किस तरह का सहयोग देते हैं? अपने अनुभव लिखिए।
Answer: प्रातःकाल सोकर उठने से लेकर रात्रि को शयन करने तक, हमारे दैनिक जीवन के अधिकांश कार्य प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से समाज के विभिन्न लोगों के सहयोग से संपन्न होते हैं। दिन की शुरुआत में दूधवाला शुद्ध दूध पहुँचाता है, और बिजली - पानी की आपूर्ति करने वाले कर्मचारी हमारी सुबह को सुगम बनाते हैं। विद्यालय जाने के लिए हमें बस चालक और सह - चालक (कंडक्टर) का सहयोग मिलता है। स्कूल में शिक्षक हमें अमूल्य शिक्षा देते हैं, और सहपाठी पढ़ाई - लिखाई के कार्यों में हमारी मदद करते हैं। संध्या को घर लौटने पर माता - पिता का स्नेहमयी मार्गदर्शन मिलता है, दुकानदार हमारी दैनिक आवश्यकताओं की सामग्री प्रदान करते हैं, और सफाईकर्मी हमारे परिवेश को स्वच्छ रखने का महत्वपूर्ण कार्य करते हैं।
इस परस्पर निर्भर व्यवस्था में, मैं भी यथासंभव दूसरों के कार्यों में अपना योगदान देने का प्रयास करता हूँ। घर पर मैं माता - पिता के दैनिक कार्यों में हाथ बँटाता हूँ और अपने छोटे भाई - बहनों को उनके गृहकार्य व पढ़ाई में सहयोग देता हूँ। विद्यालय में सहपाठियों की किसी विषय को समझने में मदद करता हूँ और आवश्यकता पड़ने पर मित्रों के साथ अपनी अध्ययन सामग्री साझा करता हूँ। साथ ही, अपने आसपास के वातावरण को साफ रखकर और यातायात के नियमों का पालन करके मैं एक सजग नागरिक के रूप में समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता हूँ।
In simple words: हमारे सुबह से शाम तक के काम जैसे दूध मिलना, स्कूल जाना या पढ़ना, दूसरों की मदद से पूरे होते हैं। उसी तरह हम भी घर के कामों में मदद करके और दूसरों के प्रति अच्छे व्यवहार से अपना सहयोग देते हैं।

Exam Tip: इस उत्तर को दो स्पष्ट अनुच्छेदों में प्रस्तुत करें - पहले में दूसरों से मिलने वाले सहयोग का विवरण दें और दूसरे में आपके द्वारा समाज को दिए जाने वाले सहयोग का उल्लेख करें।

 

Question 2. (ख) उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित शब्द ‘बहुतों’ में कौन-कौन सम्मिलित होंगे, अनुमान के आधार पर लिखिए।
Answer: प्रस्तुत संदर्भ में रेखांकित शब्द 'बहुतों' का आशय समाज के उन तमाम व्यक्तियों व समूहों से है, जिनके सहयोग, सेवा और श्रम पर हमारा संपूर्ण जीवन सुचारू रूप से आश्रित है। इस वृहद समूह में सबसे पहले हमारे परिवार के सदस्य जैसे माता - पिता, भाई - बहन और सगे - संबंधी आते हैं, जो हमारे पालन - पोषण और प्राथमिक संस्कारों की आधारशिला रखते हैं। इसके अतिरिक्त, हमारे ज्ञानवर्धन में सहायक शिक्षक, हमारे साथी, सहपाठी, मित्र और पड़ोसी भी इस श्रेणी का महत्वपूर्ण अंग हैं।
दैनिक आवश्यकताओं की सुचारू आपूर्ति करने वाले श्रमजीवी लोग जैसे दूध देने वाला, सब्जी विक्रेता, किराना दुकानदार, हमें गंतव्य तक पहुँचाने वाले बस व ऑटो चालक, हमारे परिवेश को स्वच्छ रखने वाले सफाईकर्मी, अस्वस्थ होने पर हमारा उपचार करने वाले डॉक्टर, नर्स तथा हमारी सुरक्षा सुनिश्चित करने वाले पुलिसकर्मी आदि भी इस 'बहुतों' शब्द की व्यापक परिधि में आते हैं। संक्षेप में, 'बहुतों' शब्द उस संपूर्ण सामाजिक चक्र का प्रतीक है जिसमें हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में एक - दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिए परस्पर जुड़ा हुआ है।
In simple words: 'बहुतों' शब्द में हमारे परिवार, दोस्तों और शिक्षकों के अलावा वे सभी लोग शामिल हैं जो हमारे दैनिक जीवन को आसान बनाते हैं, जैसे दूधवाला, दुकानदार, डॉक्टर और सफाईकर्मी।

Exam Tip: उत्तर को वर्गीकृत करते हुए पहले पारिवारिक/निकटवर्ती लोगों और फिर दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले सामाजिक सहायकों का उल्लेख करें।

 

Question 2. (ग) रचनाकार को स्वयं के लिए दूसरे लोगों से किस प्रकार के सहयोग की आवश्यकता पड़ती होगी और वह दूसरों को किस प्रकार का सहयोग देता होगा, अनुमान के आधार पर लिखिए।
Answer: एक रचनाकार या साहित्यकार के रूप में, व्यक्ति को अपने जीवन के विभिन्न चरणों में समाज के अनेक लोगों से अनूठे और रचनात्मक सहयोग की आवश्यकता होती है। बाल्यकाल में उसे अपने परिवार से स्नेह, पोषण और जीवन के आधारभूत मानवीय संस्कार प्राप्त होते हैं। अपनी बौद्धिक यात्रा के दौरान उसे शिक्षकों, गुरुओं और समकालीन समाज से अमूल्य ज्ञान, नैतिक मार्गदर्शन तथा व्यावहारिक अनुभवों का संबल मिलता है। अपनी रचनाशीलता व कल्पना को विकसित करने के लिए उसे सामाजिक परिवेश, मित्रों, सुधी पाठकों और विभिन्न विचारकों के दृष्टिकोण से सतत प्रेरणा व नवीन विचार प्राप्त होते हैं। इसके साथ ही, एक सामान्य मनुष्य होने के नाते भोजन, वस्त्र और आवास जैसी भौतिक जीवन की बुनियादी आवश्यकताओं के लिए भी वह समाज के अनगिनत श्रमजीवियों पर पूर्णतः आश्रित रहता है।
इसके प्रतिदान में, एक रचनाकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज के प्रति अपनी महत्वपूर्ण नैतिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है। वह अपने विचारों, गहरी अनुभूतियों, ज्ञान और सत्यनिष्ठ विमर्श से जनसाधारण को जागरूक बनाने का कार्य करता है। वह अपनी कृतियों के जरिए समाज को प्रगति और नैतिकता का सही मार्ग दिखाता है तथा नागरिकों के भीतर देशप्रेम, मानवीय मूल्यों और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जिम्मेदारी का भाव जाग्रत करता है। इस तरह, वह प्रत्यक्ष रूप से समाज के बौद्धिक, मानसिक और नैतिक उत्थान में अपना अतुलनीय योगदान देता है।
In simple words: रचनाकार को लिखने के लिए समाज से विचार, शिक्षा और प्रेरणा मिलती है। बदले में वह अपनी रचनाओं के जरिए समाज को अच्छे संस्कार, ज्ञान और देशभक्ति की राह दिखाता है।

Exam Tip: रचनाकार के पारस्परिक संबंधों को समझाते हुए पहले 'समाज से प्राप्त सहयोग' (विचार व प्रेरणा) और फिर 'समाज को प्रदत्त सहयोग' (बौद्धिक व नैतिक उत्थान) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 3. (क) उपर्युक्त वाक्य के रेखांकित अंश “युद्ध में लड़ना ही तो काम नहीं होता” के आधार पर लिखिए कि देश की प्रगति, विकास एवं सुरक्षा के प्रति हम सभी के क्या-क्या दायित्व हैं? अपने उत्तर को विस्तार देने के लिए अपने घर या पास-पड़ोस के बड़ों और अध्यापक से चर्चा करके लिखिए।
Answer: इस रेखांकित वाक्यांश का अभिप्राय यह है कि किसी भी सामूहिक लक्ष्य या महासंग्राम की विजय में केवल अग्रिम पंक्ति के योद्धाओं का ही श्रम नहीं होता, अपितु पृष्ठभूमि में रहकर रसद पहुँचाने वाले, रणनीति बनाने वाले और नैतिक समर्थन देने वाले हर एक व्यक्ति का योगदान समान रूप से अमूल्य होता है। इसी सिद्धांत को यदि हम अपने देश की प्रगति, चहुँमुखी विकास और आंतरिक व बाह्य सुरक्षा पर लागू करें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि देश के प्रत्येक नागरिक का राष्ट्र के प्रति एक महत्वपूर्ण नैतिक व सामाजिक दायित्व है।
एक सुदृढ़ राष्ट्र के निर्माण के लिए यह अनिवार्य है कि हम सभी अपने - अपने नियत कार्यों का संपादन पूरी ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा और लगन के साथ करें। विद्यार्थियों का मुख्य दायित्व मन लगाकर विद्या अर्जन करना है, ताकि वे कल के जिम्मेदार, विवेकशील और योग्य नागरिक बन सकें। देश के नागरिकों को राजकीय नियमों व कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए, समय पर करों (टैक्स) का भुगतान करना चाहिए, रेल, बस, पार्क जैसी सार्वजनिक संपत्तियों की सुरक्षा करनी चाहिए और अपने परिवेश को साफ - सुथरा रखना चाहिए। समाज में सांप्रदायिक सद्भाव, आपसी प्रेम व भाईचारा बनाए रखना तथा कमजोर व शोषित वर्गों की मदद करना भी राष्ट्र को आंतरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए आवश्यक है।
इसके अतिरिक्त, लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपने मताधिकार का प्रयोग कर एक योग्य प्रतिनिधि का चुनाव करना, देश के हितों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण रखना और समाज में होने वाले अनैतिक व गलत कार्यों का शांतिपूर्वक विरोध करना भी हमारे बुनियादी कर्तव्यों में शामिल है। इस तरह, रणक्षेत्र में न लड़ते हुए भी, एक आम नागरिक अपने दैनिक छोटे - छोटे सत्कर्मों से राष्ट्र की प्रगति और विकास की महायज्ञ में अपनी आहुति दे सकता है।
In simple words: इस पंक्ति का अर्थ है कि देश की तरक्की के लिए केवल सीमा पर लड़ना ही काफी नहीं है, बल्कि हम सबका यह कर्तव्य है कि हम ईमानदारी से काम करें, नियमों का पालन करें, टैक्स दें और देश में एकता बनाए रखें।

Exam Tip: इस उत्तर को और स्पष्ट करने के लिए नागरिक कर्तव्यों (जैसे टैक्स देना, कानून का पालन करना) और सामाजिक सद्भाव को अलग - अलग बिंदुओं के माध्यम से विश्लेषित करें।

 

Question 3. (ख) अपने पास-पड़ोस में विचरने वाले पशु-पक्षियों की जीवनचर्या का अवलोकन कीजिए और अपने अवलोकन के आधार पर लिखिए कि आप उनके संघर्षों को किस रूप में देखते हैं?
Answer: यदि हम अपने आस - पास स्वतंत्र रूप से विचरने वाले पशु - पक्षियों जैसे आवारा कुत्तों, गायों, बिल्लियों, कबूतरों और छोटी गौरैया आदि की दैनिक जीवनचर्या को ध्यानपूर्वक देखें, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रकृति की गोद में उनका जीवन भी हमारे समान ही एक निरंतर चलने वाला कड़ा संघर्ष है। उन्हें अपनी बुनियादी आवश्यकताओं जैसे भोजन की एक - एक कौर और स्वच्छ पानी की तलाश में सुबह से शाम तक मीलों इधर - उधर भटकना पड़ता है। अक्सर गलियों में भोजन के छोटे से टुकड़े के लिए कुत्तों को आपस में हिंसक रूप से संघर्ष करते हुए देखा जा सकता है। भीषण गर्मी की तपिश, कंपाने वाली शीत ऋतु की ठिठुरन और मूसलाधार वर्षा के प्रकोप को भी उन्हें खुले आसमान के नीचे ही सहना पड़ता है, क्योंकि उनके पास मनुष्यों की तरह सुरक्षित और पक्के घरों का आश्रय नहीं होता।
इसी प्रकार नन्हे पक्षियों को भी तिनका - तिनका जोड़कर अपना घोंसला बनाने, बाज या चील जैसे परजीवियों से अपने अंडों और चूजों की रक्षा करने और अपने बच्चों का पेट भरने के लिए मीलों दूर उड़कर दाना जुटाने में अत्यधिक श्रम करना पड़ता है। शहरीकरण के कारण लगातार कटते जा रहे पेड़ों ने उनके इस प्राकृतिक रहन - सहन को और भी अधिक दूषित व कठिन बना दिया है।
प्रेमचंद जी की अमर कहानी 'दो बैलों की कथा' के नायक हीरा और मोती के समान ये मूक जीव भी हमारे समक्ष अटूट मेहनत, मूक सहनशीलता और अदम्य जीवटता का सजीव उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे बिना किसी शिकायत या विरोध के अपने जीवन की समस्त विवशताओं का मौन रहकर सामना करते हैं, जो हमें जीवन में धीरज, अडिग संघर्ष और कठिन परिश्रम करने की अनमोल शिक्षा देता है।
In simple words: हमारे आसपास के पशु-पक्षी जैसे कुत्ते, गाय या गौरैया भी रोज भोजन और सुरक्षित ठिकाने के लिए बहुत मेहनत करते हैं। वे मौसम की मार और भूख को सहते हुए बिना किसी शिकायत के जीना सिखाते हैं।

Exam Tip: इस उत्तर में पशु-पक्षियों के दैनिक जीवन की तीन मुख्य कठिनाइयों (भोजन का संकट, मौसम की मार, और सुरक्षित आश्रय का अभाव) को स्पष्ट रूप से दर्शाएं।

 

Question 3. (ग) इस निबंध में जीवन को युद्ध क्यों कहा गया है? आप अपने घर के बड़ों से इस विषय पर चर्चा करके उनके और अपने विचार लिखिए।
Answer: इस निबंध के अंतर्गत जीवन की उपमा एक 'युद्ध' से की गई है क्योंकि मानव जीवन की यात्रा निरंतर आने वाली चुनौतियों, अनवरत संघर्षों और सतत प्रयासों की एक लंबी श्रृंखला है। जिस प्रकार किसी युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए केवल अस्त्र - शस्त्र चलाना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि एक सुदृढ़ योजना का होना, सहयोगियों का साथ मिलना और विषम क्षणों में धैर्य बनाए रखना आवश्यक होता है; ठीक उसी तरह हमारे जीवन के संघर्षों को पार करने और सफलता हासिल करने के लिए भी हमें अनेक स्तरों पर निरंतर सार्थक प्रयास करने पड़ते हैं।
इस विषय पर जब मैंने अपने परिवार के वरिष्ठ जनों से विमर्श किया, तो उन्होंने बहुत सुंदर दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, जीवन के हर सोपान पर व्यक्ति को उत्तम शिक्षा अर्जित करने, उपयुक्त आजीविका (रोजगार) प्राप्त करने, पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन करने और सामाजिक सरोकारों को सँभालने जैसी अनेक व्यावहारिक समस्याओं व चुनौतियों से जूझना पड़ता है। ऐसी विपरित परिस्थितियों में अडिग धीरज, सतत श्रम और उचित समय पर विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता ही सबसे महत्वपूर्ण साबित होती है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यद्यपि हर मनुष्य की जीवन - यात्रा का संघर्ष भिन्न - भिन्न होता है, किंतु बिना पुरुषार्थ और अनवरत संघर्ष के जीवन में वास्तविक प्रगति और आत्मिक विकास संभव नहीं है।
मेरे निजी विचारों के अनुसार भी, जीवन को एक युद्ध की संज्ञा देना सर्वथा न्यायसंगत है। इस संसार में प्रत्येक नागरिक को अपने पावन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए अदम्य साहस, पुरुषार्थ और आत्मसंयम के साथ निरंतर आगे की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि इस जीवन रूपी समर में हम अकेले विजयी नहीं हो सकते; समाज के अन्य सहजीवियों का परस्पर सहयोग और हमारी सकारात्मक सोच ही हमें इस महासंग्राम में अंततः सफल व विजयी बनाती है।
In simple words: जीवन को युद्ध इसलिए कहा गया है क्योंकि इसमें हमें हर कदम पर समस्याओं, कठिनाइयों और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस लड़ाई को जीतने के लिए हमें धैर्य, मेहनत और दूसरों के सहयोग की जरूरत होती है।

Exam Tip: उत्तर को तीन स्पष्ट पैराग्राफ में विभाजित करें - पहले में निबंधकार के विचार, दूसरे में पारिवारिक बड़ों के अनुभव और तीसरे में आपके स्वयं के संतुलित विचारों को प्रस्तुत करें।

 

Question 3. (घ) देश की भौगोलिक सीमाओं की रक्षा सैनिक करते हैं। इसी तरह हमारे आस-पास हमारे जीवन को बेहतर बनाने के लिए अनेक लोग कार्यरत हैं। ये कौन-कौन लोग हैं और उनके लिए आप क्या-क्या कर सकते हैं?
Answer: जिस प्रकार हमारे देश की बाहरी व भौगोलिक सीमाओं की रक्षा हमारे पराक्रमी सैनिक दिन - रात जागकर करते हैं, ठीक उसी तरह हमारे दैनिक सामाजिक जीवन को सुरक्षित, व्यवस्थित और सुचारू बनाए रखने के लिए समाज के कई वर्ग लगातार काम करते हैं। इस विशाल सहायक तंत्र में हमारे आसपास रहने वाले सफाईकर्मी, हमें नया जीवन देने वाले डॉक्टर और नर्स, हमें सुसंस्कृत बनाने वाले शिक्षक, आंतरिक शांति स्थापित करने वाले पुलिसकर्मी, पत्र पहुँचाने वाले डाकिया, दूध और सब्जी विक्रेता, बस व ऑटो चालक तथा हमारे घरों में विद्युत व जल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने वाले तकनीकी कर्मचारी शामिल हैं। ये सभी कर्मठ लोग अपने - अपने कर्तव्यों का पालन कर समाज को रहने योग्य व सभ्य बनाते हैं।
इन सभी श्रमजीवियों के श्रम और उनके योगदान के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए हम अपने स्तर पर कई छोटे - छोटे किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं, जैसे -
• हमें हमेशा उनके काम के प्रति पूरा आदर व सम्मान भाव रखना चाहिए।
• उनके राजकीय व सामाजिक कर्तव्यों के संपादन में कभी भी अनावश्यक बाधा नहीं उत्पन्न करनी चाहिए।
• उनके द्वारा प्रदान की गई सेवाओं का समय पर उचित व आदरपूर्वक भुगतान करना चाहिए।
• हमें अपने आसपास गंदगी नहीं फैलानी चाहिए, ताकि हमारे सफाईकर्मी भाइयों का श्रम कम हो सके।
• हमें नागरिक नियमों और यातायात के कानूनों का दृढ़ता से पालन करना चाहिए, जिससे पुलिस व प्रशासनिक तंत्र पर काम का अतिरिक्त बोझ न बढ़े।
इसके अतिरिक्त, संकट के समय उनके प्रति सहानुभूति रखना, उनका आभार प्रकट करना और आवश्यकता पड़ने पर आगे बढ़कर उनकी हर संभव मदद करना भी हमारा एक जागरूक नागरिक के रूप में परम कर्तव्य है। इस प्रकार हम उनके श्रम का सम्मान कर एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण कर सकते हैं।
In simple words: हमारे दैनिक जीवन को आसान बनाने के लिए शिक्षक, डॉक्टर, पुलिस, सफाईकर्मी और दूधवाले जैसे कई लोग मेहनत करते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम उनका सम्मान करें, कचरा न फैलाएं और उनके काम में मदद करें।

Exam Tip: समाज के विभिन्न सहायक वर्गों की सूची बनाने के बाद, उनके प्रति किए जाने वाले आपके कर्तव्यों को सुंदर बुलेट पॉइंट (•) के माध्यम से प्रस्तुत करें।

 

Question 4. (क) उपर्युक्त पंक्ति के आधार पर लिखिए कि पास-पड़ोस के लोगों में किस तरह के पारस्परिक संबंध रहे होंगे?
Answer: इस मर्मस्पर्शी पंक्ति के आधार पर यह भली - भाँति स्पष्ट होता है कि पूर्व काल में पास - पड़ोस के लोगों के बीच अत्यंत घनिष्ठ, आत्मीय, निश्छल व पारिवारिक संबंध रहे होंगे। पड़ोसी केवल भौगोलिक रूप से पास रहने वाले अजनबी लोग नहीं थे, बल्कि वे एक - दूसरे के सुख - दुख के सच्चे सहभागी व आत्मीय जन थे। बच्चों को पड़ोस की माताओं और पिताओं से भी वही ममता, दुलार और संरक्षण प्राप्त होता था, जो उन्हें अपने स्वयं के परिवार से मिलता था।
ऐसे उत्तम सामाजिक संबंधों में निश्छल अपनापन, निःस्वार्थ सहयोग और गहरे विश्वास की भावना कूट - कूट कर भरी होती थी। लोग एक - दूसरे की कठिनाइयों में बिना बुलाए सहायता के लिए तत्पर रहते थे, और हर उत्सव या मांगलिक कार्य को पूरा मोहल्ला मिलकर एक उत्सव की तरह मनाता था। बच्चों की देखरेख और उनका पोषण केवल माता - पिता की नहीं, बल्कि पूरे पड़ोस की साझी जिम्मेदारी मानी जाती थी। संक्षेप में कहें, तो उस समय का पड़ोस एक विशाल और सुखी परिवार की तरह प्रेम और सौहार्द की मजबूत डोर से बंधा हुआ था।
In simple words: इस पंक्ति से पता चलता है कि पहले पड़ोस के लोगों में बहुत गहरा और सगा संबंध होता था। वे एक - दूसरे के दुखों और खुशियों को मिलकर बांटते थे और बच्चे पूरे मोहल्ले के प्यार से बड़े होते थे।

Exam Tip: पड़ोस के पारस्परिक संबंधों को परिभाषित करते हुए 'आत्मीयता', 'पारिवारिक स्नेह' और 'साझा जिम्मेदारी' जैसे मुख्य सामाजिक बिंदुओं को उत्तर में रेखांकित करें।

 

Question 4. (ख) वर्तमान समय में ऐसे संबंधों में किस तरह के परिवर्तन आए हैं और इनके क्या कारण हो सकते हैं? लिखिए।
Answer: वर्तमान समय के आधुनिक समाज में पड़ोसियों के मध्य के उन घनिष्ठ और अपनत्व भरे संबंधों में काफी गिरावट और नकारात्मक बदलाव आया है। आज के युग में लोग अत्यंत व्यस्त हो चुके हैं और केवल अपने निजी व पारिवारिक जीवन के दायरे तक ही सीमित रहने लगे हैं, जिसके कारण आपसी संवाद और मिलना - जुलना बहुत कम हो गया है। पहले जहाँ पड़ोसी एक - दूसरे के दुख में तुरंत भागीदार बनते थे, वहीं अब उनके बीच केवल एक औपचारिक शिष्टाचार और दूरी रह गई है। लोग अक्सर बगल के फ्लैट में रहने वाले पड़ोसी के नाम और कार्य से भी अनभिज्ञ रहते हैं।
इन परिवर्तनों के पीछे कई महत्वपूर्ण सामाजिक व तकनीकी कारण उत्तरदायी हैं, जो इस प्रकार हैं:
• भागदौड़ भरी आधुनिक जीवनशैली और अत्यधिक काम का मानसिक दबाव, जिससे लोगों के पास फुर्सत का अभाव है।
• मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट जैसी तकनीकी सुविधाओं का अत्यधिक उपयोग, जिससे लोग वास्तविक सामाजिक संपर्कों की तुलना में डिजिटल माध्यमों पर अधिक समय व्यतीत करते हैं।
• व्यक्तिवाद और निजता (प्राइवेसी) की बढ़ती हुई प्रवृत्ति, जहाँ लोग दूसरों के जीवन में हस्तक्षेप या जुड़ाव पसंद नहीं करते।
• बड़े महानगरों में लगातार होने वाला स्थानांतरण (स्थान परिवर्तन) और सुरक्षा संबंधी विभिन्न आशंकाएं, जिनके कारण लोग अपने पड़ोसियों पर आसानी से विश्वास नहीं कर पाते।
अतः, इन जीवनशैलीगत और तकनीकी बदलावों के कारण आज पड़ोस का वह पारिवारिक ढांचा बिखर गया है और पारस्परिक संबंध पहले की तुलना में काफी शिथिल व कमजोर हो गए हैं।
In simple words: आजकल की भागदौड़, काम की व्यस्तता और मोबाइल - इंटरनेट के अधिक उपयोग के कारण पड़ोसियों में आपसी बातचीत और मिलना - जुलना बहुत कम हो गया है। अब लोग अपने निजी जीवन में ज्यादा व्यस्त रहते हैं।

Exam Tip: वर्तमान संबंधों में आए बदलावों के दो मुख्य पहलुओं - तकनीकी प्रभाव (मोबाइल/इंटरनेट) और सामाजिक बदलाव (व्यक्तिवाद) को उत्तर में प्रमुखता से उजागर करें।

 

Question 5. “क्या सुरुचि और सौंदर्य को आपके किसी काम से ठेस लगती है?” अपने घर/विद्यालय के आसपास, सार्वजनिक संसाधनों और ऐतिहासिक महत्व के स्थानों की स्वच्छता एवं सौंदर्य को बनाए रखने के लिए आप और आपके सहपाठी, संबंधी क्या-क्या करते हैं?
Answer: हम सभी अपने घर, विद्यालय के परिसर और सामाजिक सार्वजनिक स्थलों के सौंदर्य व स्वच्छता को सुरक्षित रखने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर कई छोटे - छोटे परंतु अत्यंत प्रभावशाली प्रयास करते हैं, जो इस प्रकार हैं:
• गृह स्तर पर प्रयास: हम अपने घर के कचरे को इधर - उधर न फेंककर केवल निर्धारित कूड़ेदान में ही डालते हैं तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए प्लास्टिक की थैलियों और वस्तुओं का उपयोग न्यूनतम करने का संकल्प लेते हैं.
• विद्यालय स्तर पर प्रयास: हम और हमारे सहपाठी अपनी कक्षाओं को सदैव स्वच्छ रखते हैं, सूखे व गीले कचरे के लिए डस्टबिन का उपयोग करते हैं तथा विद्यालय के फर्नीचर, बेंचों या दीवारों पर कुछ भी लिखकर उन्हें गंदा नहीं करते हैं.
• सार्वजनिक स्थलों पर प्रयास: बस अड्डों, उद्यानों (पार्क) या सड़कों पर चलते समय हम कभी भी रैपर या बोतलें नहीं फेंकते। हम पौधों और वृक्षों की सुरक्षा का ध्यान रखते हैं तथा अन्य नागरिकों को भी स्वच्छता का महत्व समझाकर जागरूक करते हैं.
• ऐतिहासिक धरोहरों पर प्रयास: जब भी हम किसी ऐतिहासिक स्मारक या किले के भ्रमण पर जाते हैं, तो वहाँ की पवित्रता और सफाई बनाए रखने का विशेष ध्यान रखते हैं। हम स्मारकों की दीवारों पर अपना नाम लिखकर उन्हें विकृत नहीं करते और वहाँ के राजकीय नियमों का पालन करते हैं.
इसके अतिरिक्त, हम समय - समय पर आयोजित होने वाले स्वच्छता अभियानों में उत्साहपूर्वक भाग लेते हैं और जनसाधारण को यह समझाते हैं कि एक स्वच्छ और सुंदर परिवेश ही हमारे उत्तम स्वास्थ्य और सुखी जीवन की रीढ़ है। इस प्रकार हम सभी मिलकर अपने परिवेश की सुंदरता को अक्षुण्ण रखने में सक्रिय योगदान देते हैं।
In simple words: हम अपने घर और स्कूल को साफ रखते हैं, डस्टबिन का उपयोग करते हैं और ऐतिहासिक जगहों की दीवारों पर कुछ नहीं लिखते। हम कचरा न फैलाकर अपने परिवेश को सुंदर और स्वस्थ बनाने में मदद करते हैं।

Exam Tip: इस उत्तर को चार अलग - अलग शीर्षकों (घर, विद्यालय, सार्वजनिक स्थान और ऐतिहासिक धरोहर) के अंतर्गत वर्गीकृत करके बिंदुवार लिखें, जिससे उत्तर अत्यंत सुव्यवस्थित दिखेगा।

 

Question 6. “मैं कोई ऐसा काम न करूँ जिससे मेरे देश की स्वतंत्रता को, दूसरे शब्दों में, उसके सम्मान को धक्का पहुँचे।” देश के सम्मान को धक्का न पहुँचे, इसके लिए क्या करें और क्या नहीं करें?
Answer: अपने राष्ट्र के गौरव, मान - सम्मान और संप्रभुता की रक्षा करने के लिए प्रत्येक सजग नागरिक को अपने दैनिक आचरण में कई नैतिक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। इस प्रसंग को हम निम्नलिखित दो महत्वपूर्ण सूचियों के माध्यम से भली - भांति समझ सकते हैं:

हमें राष्ट्र के सम्मान की रक्षा हेतु क्या-क्या करना चाहिए:
• अपने नागरिक कर्तव्यों और दायित्वों का सदैव पूरी ईमानदारी व निष्ठा से पालन करना चाहिए।
• देश के संविधान, राजकीय नियमों और कानूनों का हमेशा स्वेच्छा से पालन करना चाहिए।
• विद्यालय, सड़क, ऐतिहासिक धरोहरों और उद्यानों जैसी सार्वजनिक संपत्तियों को अपनी निजी संपत्ति मानकर उनकी रक्षा करनी चाहिए।
• अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखनी चाहिए और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।
• अपने राष्ट्र के गौरवशाली इतिहास, सांस्कृतिक मूल्यों और विभिन्न क्षेत्रों में अर्जित उपलब्धियों पर सदैव गर्व करना चाहिए।
• लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत अपने विवेक से योग्य प्रतिनिधियों का चुनाव करना चाहिए और एक जागरूक नागरिक की भूमिका निभानी चाहिए।
• सभी धर्मों, संस्कृतियों और वर्गों के लोगों का आदर करना चाहिए और देश की अखंडता व एकता को सुदृढ़ बनाना चाहिए।

हमें भूलकर भी क्या-क्या नहीं करना चाहिए:
• सार्वजनिक या ऐतिहासिक स्थलों पर गंदगी नहीं फैलानी चाहिए और न ही राष्ट्रीय संपत्ति को कोई नुकसान पहुँचाना चाहिए।
• अंतरराष्ट्रीय मंचों या सोशल मीडिया पर अपने देश की छवि को धूमिल करने वाली बातें या झूठी अफवाहें नहीं फैलानी चाहिए।
• किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार में शामिल नहीं होना चाहिए और न ही राजकीय नियमों व कानूनों की अवहेलना करनी चाहिए।
• समाज में सांप्रदायिकता, आपसी कटुता, झगड़े, संकीर्ण भेदभाव और घृणा की भावना को कभी भी बढ़ावा नहीं देना चाहिए।
संक्षेप में कहें, तो हम अपने दैनिक जीवन के इन सीधे व छोटे - छोटे आचरणों से ही देश की मर्यादा को वैश्विक पटल पर अक्षुण्ण रख सकते हैं।
In simple words: देश के सम्मान के लिए हमें नियमों का पालन करना चाहिए, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करनी चाहिए और समाज में एकता रखनी चाहिए। हमें कभी भी गंदगी नहीं फैलानी चाहिए, भ्रष्टाचार नहीं करना चाहिए और आपसी नफरत को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।

Exam Tip: इस उत्तर को दो स्पष्ट सूचियों - 'क्या करें' और 'क्या न करें' के अंतर्गत वर्गीकृत कर बिंदुवार प्रस्तुत करें, जिससे परीक्षक को उत्तर का प्रारूप स्पष्ट रूप से समझ आए।

 

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मेरे प्रश्न

 

Question (क). रचनाकार को किस तरह के प्रश्नों का उत्तर देने में आनंद आता है?
Answer: निबंधकार को मुख्य रूप से उन प्रश्नों का प्रत्युत्तर देने में आंतरिक संतोष व आनंद की अनुभूति होती है, जो उनकी चिंतन प्रक्रिया को एक नया आयाम प्रदान करते हैं, विषय को विस्तार देते हैं और किसी भी गूढ़ तथ्य को गहराई से विश्लेषित करने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
In simple words: रचनाकार को उन सवालों के जवाब देना बहुत अच्छा लगता है जो उनकी सोच को और आगे बढ़ाते हैं और अपनी बात को विस्तार से समझाने में मदद करते हैं।

Exam Tip: उत्तर में 'विचारों का विस्तार' और 'गहन विश्लेषण' जैसे पारिभाषिक शब्दों का उपयोग करें।

 

Question (ख). आपको किस तरह के प्रश्नों को बूझना रोचक लगता है?
Answer: मुझे व्यक्तिगत रूप से उन पहेलियों या प्रश्नों को हल करना और सोचना अत्यंत रुचिकर प्रतीत होता है, जो हमारी बौद्धिक क्षमता को चुनौती देते हैं, सोचने के लिए विवश करते हैं, हमें एक नया दृष्टिकोण प्रदान करते हैं और विषय की सूक्ष्मताओं को भली - भांति समझने का अवसर देते हैं।
In simple words: मुझे वे प्रश्न सुलझाना बहुत मजेदार लगता है जो हमारे दिमाग को सोचने पर मजबूर करते हैं और हमें कुछ नया सीखने का मौका देते हैं।

Exam Tip: उत्तर में 'बौद्धिक चुनौती' और 'नया दृष्टिकोण' जैसे सकारात्मक पहलुओं को अपने अनुभव से जोड़कर प्रस्तुत करें।

 

Question. अब इस निबंध के आलोक में नीचे दी गई सामग्री को पढ़कर तीन प्रश्न बनाइए और लिखिए।
Answer: दिए गए अनुच्छेद के आधार पर निम्नलिखित तीन महत्वपूर्ण व प्रासंगिक प्रश्न बनाए जा सकते हैं:
१. क्या यह सोचना न्यायसंगत है कि केवल समृद्ध लोग ही राष्ट्र की प्रगति में सहायक हो सकते हैं? विस्तार से समझाएं।
२. एक सामान्य नागरिक अपने व्यक्तिगत स्तर पर राष्ट्र की उन्नति और सुरक्षा में किस प्रकार अपनी भागीदारी निभा सकता है?
३. किसी भी व्यक्ति के अनुचित या देशविरोधी कार्यों का राष्ट्र की वैश्विक छवि पर क्या असर पड़ता है?
In simple words: दिए गए पैराग्राफ को पढ़कर हमने तीन मुख्य प्रश्न बनाए हैं जो देश के विकास, नागरिकों के योगदान और उनके आचरण के प्रभाव पर आधारित हैं।

Exam Tip: किसी अनुच्छेद से प्रश्न बनाते समय इस बात का ध्यान रखें कि प्रश्न सीधे और स्पष्ट हों तथा उनके उत्तर अनुच्छेद की सामग्री में स्पष्ट रूप से निहित हों।

 

लेखक परिचय – कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’

  • नाम: कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'
  • जन्म: सन् 1906 ई.
  • स्थान: सहारनपुर जिला, उत्तर प्रदेश
  • निधन: सन् 1995 ई.
  • मुख्य कार्यक्षेत्र: वे हिंदी साहित्य के एक अत्यंत प्रख्यात पत्रकार और निबंधकार थे। उन्होंने 'नया जीवन' और 'विकास' नामक महत्वपूर्ण पत्रों का संपादन किया।
  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: वे अपनी युवावस्था से ही राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहे। देश की आजादी के आंदोलनों और सामाजिक कार्यों में बढ़ - चढ़कर भाग लेने के कारण उन्हें अनेक बार जेल - यात्रा भी करनी पड़ी।
  • पुरस्कार: हिंदी साहित्य और राष्ट्र के प्रति उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा प्रतिष्ठित "पद्म श्री" सम्मान से अलंकृत किया गया।
  • प्रमुख रचनाएँ: प्रभाकर जी के संस्मरणात्मक निबंध - संग्रह हिंदी जगत में अत्यंत लोकप्रिय हैं। उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं - 'दीप जले शंख बजे', 'जिंदगी मुसकरायी', 'बाजे पायलिया के घुँघरू', 'जिंदगी लहलहाई', 'क्षण बोले कण मुसकाए', 'कारवाँ आगे बढ़े', 'माटी हो गई सोना', 'महके आँगन चहके द्वार' और 'आकाश के तारे धरती के फूल'।
  • साहित्यिक विशेषता: प्रभाकर जी ने राजनीतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन के गंभीर विषयों पर अनेक उत्कृष्ट निबंध लिखे। उनकी रचनाएँ गहन मानवतावादी दृष्टिकोण और उनके सहज जीवन - दर्शन की परिचायक हैं। उनकी भाषा अत्यंत सरल, सुबोध, संवादात्मक और सीधे पाठकों के हृदय को स्पर्श करने वाली (हृदयग्राही) है।

पाठ का सारांश

  • पहला भाग - पूर्णता का भ्रम: निबंधकार प्रारंभ में यह स्वीकार करते हैं कि वे स्वयं को अपने घर, मोहल्ले और नगर के परिवेश में पूरी तरह सुखी और परिपूर्ण मानते थे। वे गर्व से सोचते थे कि उनका घर, पड़ोस, नगर और वे स्वयं कितने व्यवस्थित और परिपूर्ण हैं। किंतु उनके मन की यह संकीर्ण संतुष्टि तब खंडित हो गई जब उन्हें अपने महान देश की पराधीनता का भान हुआ।
  • दूसरा भाग - लाला लाजपत राय का अनुभव और मानसिक भूचाल: यह प्रसंग पंजाब - केसरिलाला लाजपत राय जी के विदेशी अनुभवों से जुड़ा है। उन्होंने विदेशों की यात्रा की और यह निष्कर्ष निकाला कि चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने में चले जाएं, पराधीन भारत के नागरिक होने के कारण उनके माथे पर गुलामी की लज्जा का कलंक सदैव बना रहता था। इस सत्य ने लेखक के मन के झूठे संतोष को गहरी टीस में बदल दिया।
  • तीसरा भाग - नागरिक का कर्तव्य और अधिकार: इस गंभीर चिंतन के आलोक में लेखक यह सोचते हैं कि एक जागरूक नागरिक के रूप में उनका यह परम कर्तव्य है कि वे कोई ऐसा कार्य न करें जिससे देश की स्वतंत्रता और मान - सम्मान को ठेस पहुँचे। इसके साथ ही, उन्हें यह भी अधिकार है कि वे देश के सम्मान में अपना पूरा योगदान दें। वे कहते हैं कि नागरिक और देश कभी दो अलग सत्ता नहीं हो सकते।
  • चौथा भाग - साधारण नागरिक का योगदान: लेखक यह विचार उठाते हैं कि जो आम आदमी केवल अपनी दैनिक रोजी - रोटी की चिंता में व्यस्त रहता है, वह देश के लिए क्या कर सकता है? इसके प्रत्युत्तर में वे जीवन की तुलना एक महासमर (युद्ध) से करते हैं। युद्ध में केवल लड़ना ही महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि पीछे रहकर रसद उगाना (किसान) और सैनिकों का उत्साह बढ़ाना (दर्शक) भी उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है। इसी तरह हर नागरिक अपने तरीके से देश - सेवा कर सकता है। "अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा" जैसी कहावतों को वे पूरी तरह असत्य सिद्ध करते हैं।
  • पांचवाँ भाग - जापानी युवक की अनुकरणीय कहानियाँ: निबंध में दो प्रेरक प्रसंगों का उल्लेख है। पहली कहानी में स्वामी रामतीर्थ ने जापान की यात्रा के दौरान जब यह कहा कि शायद यहाँ अच्छे फल नहीं मिलते, तो एक जापानी युवक ने मीलों दौड़कर उनके लिए फल जुटाए। उसने मूल्य के बदले केवल यही निवेदन किया कि वे अपने देश जाकर जापान के फलों की निंदा न करें। दूसरे प्रसंग में, एक विदेशी छात्र ने जापानी पुस्तकालय की मूल्यवान पुस्तक से दुर्लभ चित्र चुराए, जिसके दंड स्वरूप पुस्तकालय के बाहर बोर्ड लगा दिया गया कि उस देश के किसी भी नागरिक का प्रवेश वर्जित है। पहले युवक ने देश का मस्तक ऊँचा किया, जबकि दूसरे ने कलंकित किया।
  • छठा भाग - भावना का महत्व और कमालपाशा: लेखक प्रतिपादित करते हैं कि किसी भी कार्य की महानता उसकी विशालता में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे निश्छल भाव में निहित होती है। तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा ने एक निर्धन बूढ़े किसान द्वारा दिए गए पाव - भर शहद के साधारण उपहार को ससम्मान स्वीकार किया और उसे शाही सम्मान देकर विदा किया। इसी तरह भारत में एक किसान ने रंगीन सुतलियों से बुनी साधारण खाट पंडित नेहरू को भेंट की और नेहरू जी ने आदरपूर्वक हस्ताक्षर युक्त चित्र देकर उस किसान की सच्ची भावना का सम्मान किया।
  • सातवां भाग - शक्ति - बोध और सौंदर्य - बोध की आवश्यकता: निबंधकार स्पष्ट करते हैं कि किसी भी राष्ट्र की मजबूती के लिए दो बातें अनिवार्य हैं - 'शक्ति - बोध' (अपनी शक्ति पर अटूट विश्वास) और 'सौंदर्य - बोध' (स्वच्छ आचरण व सुरुचि)। यदि कोई नागरिक अपने देश की तुलना दूसरे देशों से हीन मानकर करता है, तो वह राष्ट्र के शक्ति - बोध को नष्ट करता है, जैसे शल्य ने महाबली कर्ण के आत्मविश्वास को संदेह डालकर नष्ट किया था। वहीं, यदि नागरिक सड़कों पर कूड़ा फेंकता है या अशिष्ट आचरण करता है, तो वह सौंदर्य - बोध को गहरी ठेस पहुँचाता है।
  • आठवाँ भाग - चुनाव: देश की उच्चता और हीनता की कसौटी: किसी भी राष्ट्र के नागरिकों का जागरूक होना उसके लोकतंत्र की मजबूती का आधार है। चुनाव ही वह माध्यम है जिससे देश की उच्चता और हीनता तय होती है। जहाँ नागरिक योग्य और प्रतिनिधि चुनते हैं, वह देश प्रगति करता है; और जहाँ लोग अनुचित प्रभाव में आकर गलत चयन करते हैं, उस राष्ट्र का पतन सुनिश्चित है। अतः सही मतदान करना हर नागरिक का नैतिक अधिकार और कर्तव्य है।

 

निबंध विधा की विशेषताएँ

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी द्वारा रचित इस उत्कृष्ट निबंध की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विषय - केंद्रीयता: यह संपूर्ण निबंध 'व्यक्ति और उसके राष्ट्र का अटूट संबंध' नामक एकल विषय पर ही पूरी दृढ़ता से केंद्रित है।
  • प्रश्नोत्तर और संवादात्मक शैली: निबंध की शैली संवादात्मक और प्रश्नोत्तर रूप में है, जहाँ लेखक स्वयं प्रश्न उठाते हैं और तार्किक ढंग से उनके उत्तर देते हैं, जिससे पाठक का जुड़ाव निबंध के साथ बना रहता है।
  • वैयक्तिकता: लेखक उत्तम पुरुष ('मैं') का प्रयोग करते हुए अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों और विचारों को पाठकों के साथ साझा करते हैं।
  • तार्किकता और उदाहरणों का समावेश: हर वैचारिक मत को स्पष्ट करने के लिए ऐतिहासिक संदर्भों (जैसे शल्य का उदाहरण) और प्रेरक कहानियों (जैसे जापानी युवक व कमालपाशा) का सुंदर उपयोग किया गया है।
  • प्रेरणात्मकता: निबंध की कहानियाँ पाठकों के मन में सच्ची देशभक्ति, नैतिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी का संचार करती हैं।
  • सजीवता और प्रतीकात्मकता: 'भूकंप', 'दरार' और 'गाँठ' जैसे सरल प्रतीकों के उपयोग से वैचारिक चिंतन में अत्यंत सजीवता और स्पष्टता आ गई है।
  • साहित्यिक सौंदर्य: "अकेला चना क्या भाड़ फोड़े" जैसी कहावतों का व्यावहारिक प्रयोग और शल्य के चरित्र का लाक्षणिक उपयोग निबंध के साहित्यिक सौंदर्य को द्विगुणित करता है।
  • संक्षिप्तता और स्पष्टता: निबंध के विचार अत्यंत स्पष्ट, सुबोध और बिना किसी अनावश्यक विस्तार के सीधे पाठकों के समक्ष रखे गए हैं।

 

कठिन शब्द और उनके अर्थ

कठिन शब्दसरल अर्थ
संचितइकट्ठा किया हुआ, जमा किया हुआ
तेजस्वीतेजवाला, प्रतापी, शक्तिशाली
ठसकचाल - ढाल का बनावटीपन, ऐंठ, शान
रसदअनाज, खाने का सामान, राशन
दाद देनान्यायोचित प्रशंसा करना
लांछितदोषयुक्त, कलंकित
हँडियाएक प्रकार का मिट्टी का बर्तन
सुतलीसन या पटसन के रेशों से बटकर बनाई हुई डोरी
चौपालखुली या छाए हुए मंडपाकार बैठक
अपूर्णताजिसमें कमी हो, अधूरापन
भामाशाहमेवाड़ का प्रसिद्ध दानी जिसने महाराणा प्रताप की मदद की
पराधीनतादूसरे के अधीन होना, गुलामी
भाव - मुग्धभाव में खो जाना, भावनाओं में डूब जाना
कसौटीपरखने का मानदंड

 

व्याकरण - उपसर्ग और प्रत्यय

उपसर्ग वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के प्रारंभ में जुड़कर उसका अर्थ बदल देते हैं। प्रत्यय वे शब्दांश होते हैं जो किसी शब्द के अंत में जुड़कर उसके अर्थ में विशेषता लाते हैं।

शब्दउपसर्ग + मूल शब्दप्रत्यय
अपूर्णताअ + पूर्णता
अलौकिकअ + लौकिक-
निरक्षरतानिर् + अक्षरता
सम्मानितसम् + मानइत
अनावश्यकअन् + आवश्यक-
अपमानितअप + मानइत
अभिमानीअभि + मान

 

शब्द-युग्म

पाठ में प्रयुक्त कुछ प्रमुख मिलते-जुलते भाव वाले शब्द-युग्म निम्नलिखित हैं, जो भाषा को अधिक सजीव और प्रभावशाली बनाते हैं:

  • ममता - दुलार: प्रेम और लाड़ - प्यार (जैसे - पड़ोसियों की ममता - दुलार पा, बड़ा हुआ था।)
  • भरा - पूरा: संपूर्ण (जैसे - एक मनुष्य से भरा - पूरा नगर बनकर मैं खड़ा हुआ था।)
  • दाल - रोटी: साधारण जीविका (जैसे - जो बेचारा अपनी दाल - रोटी की फिक्र में लगा हो।)
  • ऊँच - नीच: जीवन के उतार - चढ़ाव, विषमताएँ
  • पुनरूक्त शब्द - युग्म: पूरा - पूरा, धीरे - धीरे, छोटी - छोटी, बड़ी - बड़ी

अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर

अति लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर

 

Question 1. “मैं और मेरा देश” निबंध के लेखक कौन हैं?
Answer: इस प्रसिद्ध वैचारिक निबंध की रचना हिंदी साहित्य के यशस्वी पत्रकार और निबंधकार कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी ने की है।
In simple words: इस निबंध के लेखक कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' हैं, जो हिंदी के एक बड़े लेखक और पत्रकार थे।

Exam Tip: लेखक का नाम 'कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर' बिल्कुल शुद्ध वर्तनी में लिखना आवश्यक है।

 

Question 2. लेखक के “आनंद की दीवार में दरार” किसने डाली?
Answer: स्वयं को अपने सीमित दायरे में पूर्ण मानने वाले लेखक की संकीर्ण संतुष्टि को पंजाब - केसरी लाला लाजपत राय जी के उन मर्मस्पर्शी विदेशी यात्रा के कटु अनुभवों ने तोड़ दिया, जिसे उन्होंने एक छोटे वाक्य में व्यक्त किया था।
In simple words: पंजाब के महान नेता लाला लाजपत राय के विदेश यात्रा के दुखी अनुभव ने लेखक के मन की झूठी संतुष्टि को तोड़ दिया था।

Exam Tip: उत्तर में लाला लाजपत राय जी के नाम के साथ 'पंजाब - केसरी' विशेषण का भी प्रयोग करें।

 

Question 3. लाला लाजपत राय का वह एक वाक्य क्या था जिसने लेखक को हिला दिया?
Answer: लाला जी ने कहा था कि "मैं अमेरिका गया, इंग्लैंड गया, फ्रांस गया और विश्व की अनेक पावन भूमियों पर घूमा, किंतु मैं जहाँ भी गया, पराधीन भारत की लज्जा और अपमान का कलंक सदैव मेरे मस्तक पर लगा रहा।" इसी पंक्ति ने लेखक के अंतःकरण को झकझोर दिया।
In simple words: लाला जी ने कहा था कि वे दुनिया के चाहे किसी भी बड़े देश में गए, गुलाम भारत का नागरिक होने के कारण अपमान का कलंक हमेशा उनके माथे पर लगा रहा।

Exam Tip: इस प्रसिद्ध कथन को दोहरे उद्धरण चिह्नों ("...") में बिना किसी त्रुटि के लिखें।

 

Question 4. “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” कहावत के बारे में लेखक का क्या मत है?
Answer: निबंधकार इस पारंपरिक कहावत को पूरी तरह से असत्य और भ्रम फैलाने वाली मानते हैं। उनका मत है कि इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जहाँ केवल एक अकेले व्यक्ति के संकल्प ने ही बहुत बड़े बदलाव को जन्म दिया है।
In simple words: लेखक इस पुरानी कहावत को पूरी तरह झूठ मानते हैं, क्योंकि इतिहास में कई बार एक अकेले व्यक्ति ने ही बहुत बड़े बदलाव किए हैं।

Exam Tip: कहावत के सामान्य अर्थ के स्थान पर लेखक के 'सकारात्मक और तार्किक दृष्टिकोण' को उजागर करें।

 

Question 5. स्वामी रामतीर्थ ने जापान में क्या कहा था?
Answer: रेल यात्रा के दौरान जब स्वामी रामतीर्थ जी को काफी तलाश करने पर भी खाने योग्य फल नहीं मिले, तो उन्होंने विवश होकर कहा था कि शायद जापान देश में उत्तम फल उपलब्ध नहीं होते हैं।
In simple words: ट्रेन में जब स्वामी रामतीर्थ को फल नहीं मिले, तो उनके मुँह से निकला कि शायद जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।

Exam Tip: उनके कथन को संक्षेप में लिखते हुए यह बताएं कि यह प्रसंग जापानी युवक की कहानी की शुरुआत करता है।

 

Question 6. जापानी युवक ने फलों के मूल्य के रूप में क्या माँगा?
Answer: उस देशभक्त जापानी बालक ने फलों के बदले धन लेने से मना कर दिया और केवल यह निवेदन किया कि स्वामी जी अपने देश जाकर किसी से यह न कहें कि जापान में अच्छे फल नहीं मिलते।
In simple words: जापानी लड़के ने पैसों के बजाय केवल यह वादा माँगा कि स्वामी जी अपने देश जाकर जापान के फलों की बुराई न करें।

Exam Tip: युवक द्वारा माँगे गए 'मूल्य' (राष्ट्र के सम्मान का वादा) को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 7. पुस्तकालय प्रसंग में जापानी पुस्तकालय ने क्या किया?
Answer: जब एक विदेशी छात्र ने पुस्तकालय की मूल्यवान पुस्तक से दुर्लभ चित्र चुराए, तो पुस्तकालय प्रशासन ने सजा के रूप में प्रवेश द्वार पर बोर्ड लगा दिया कि उस देश के किसी भी नागरिक का प्रवेश वर्जित है।
In simple words: पुस्तकालय ने चित्र चुराने वाले छात्र के पूरे देश के नागरिकों के प्रवेश पर रोक लगा दी और बाहर एक बोर्ड टांग दिया।

Exam Tip: एक नागरिक की गलती का खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ता है, इस मुख्य भाव को उत्तर में स्पष्ट करें।

 

Question 8. कमालपाशा कौन थे और उनसे जुड़ी घटना क्या है?
Answer: मुस्तफ़ा कमालपाशा तुर्की के महान राष्ट्रपति थे। उन्होंने एक निर्धन ग्रामीण वृद्ध किसान द्वारा लाए गए मात्र पाव - भर शहद के साधारण उपहार को ससम्मान स्वीकार किया और विदाई के समय उसे अपनी राजकीय शाही कार से आदरपूर्वक गाँव वापस भेजा था।
In simple words: कमालपाशा तुर्की के राष्ट्रपति थे, जिन्होंने एक गरीब बूढ़े किसान का पाव - भर शहद का उपहार बहुत आदर से लिया और उसे शाही गाड़ी से विदा किया।

Exam Tip: कमालपाशा की पहचान (तुर्की के राष्ट्रपति) और किसान के प्रति उनकी 'भावना के सम्मान' को उत्तर में मुख्य रूप से दर्शाएं।

 

Question 9. भारतीय किसान ने पंडित नेहरू को क्या उपहार दिया?
Answer: एक साधारण भारतीय किसान ने अपने हाथों से रंगीन सुतलियों से बुनी हुई एक खाट रेलगाड़ी के माध्यम से दिल्ली पहुँचाई और उसे देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को अत्यंत स्नेहपूर्वक उपहार स्वरूप प्रदान किया।
In simple words: एक भारतीय किसान ने रंगीन सुतलियों से बुनी हुई एक सुंदर खाट ट्रेन से दिल्ली लाकर पंडित नेहरू को भेंट की थी।

Exam Tip: किसान द्वारा भेंट की गई 'रंगीन सुतली की खाट' और नेहरू जी के प्रति उसके स्नेह का उल्लेख करें।

 

Question 10. देश की उच्चता और हीनता की कसौटी क्या है?
Answer: निबंध के परिप्रेक्ष्य में किसी भी राष्ट्र के गौरवशाली या हीन होने की सबसे बड़ी कसौटी 'चुनाव' की प्रक्रिया है। जिस देश की जनता जागरूक होकर बिना किसी प्रलोभन के एक योग्य और सच्चे प्रतिनिधि को अपना बहुमूल्य मत देती है, वह राष्ट्र सदैव प्रगति के पथ पर शिखर की ओर अग्रसर रहता है।
In simple words: किसी देश के अच्छे या बुरे होने की असली कसौटी वहाँ होने वाले 'चुनाव' हैं, जहाँ नागरिक सोच - समझकर सही व्यक्ति को अपना वोट देते हैं।

Exam Tip: इस उत्तर में लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ 'चुनाव' और जागरूक 'मतदान' के आपसी संबंध को स्पष्ट करें।

 

Question 11. देश को किन दो चीजों की सबसे ज्यादा जरूरत है?
Answer: प्रभाकर जी के अनुसार, किसी भी राष्ट्र के स्वाभिमान और समृद्धि के लिए सर्वप्रथम दो अत्यंत आवश्यक स्तंभों की आवश्यकता होती है, जो 'शक्ति - बोध' (अपने सामर्थ्य पर विश्वास) और 'सौंदर्य - बोध' (स्वच्छ आचरण व सुरुचि) हैं।
In simple words: देश को आगे बढ़ने के लिए दो बातों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है - पहली अपनी ताकत को समझना (शक्ति - बोध) और दूसरी सफाई व अच्छा आचरण बनाए रखना (सौंदर्य - बोध)।

Exam Tip: 'शक्ति - बोध' और 'सौंदर्य - बोध' इन दोनों दार्शनिक पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 12. शल्य का उदाहरण निबंध में किस संदर्भ में दिया गया है?
Answer: महाभारत के पात्र शल्य का उदाहरण लेखक ने राष्ट्र के 'शक्ति - बोध' को नष्ट करने वाले कुटिल नागरिकों के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार शल्य कर्ण का सारथी बनकर बार - बार उसकी शक्तियों पर संदेह करता था और अर्जुन के शौर्य का गुणगान कर कर्ण का मनोबल तोड़ता था, उसी प्रकार कुछ लोग अपने देश की हीन तुलना दूसरे देशों से कर अपने देशवासियों का आत्मविश्वास कमजोर करते हैं।
In simple words: शल्य कर्ण का सारथी था जो हमेशा उसका आत्मविश्वास कमजोर करता था। इसका उदाहरण देश के लोगों का भरोसा तोड़ने वाले नकारात्मक नागरिकों को दिखाने के लिए दिया गया है।

Exam Tip: शल्य के पौराणिक चरित्र और उसके नकारात्मक प्रभाव की तुलना देश के आत्मबल को कमजोर करने वाले आचरण से करें।

 

Question 13. “भामाशाह की तरह” यह उदाहरण किस संदर्भ में आया है?
Answer: महान दानी भामाशाह का उदाहरण लेखक ने समाज के समृद्ध और धनवान वर्ग को प्रेरित करने के संदर्भ में दिया है। वे स्पष्ट करते हैं कि संकट काल में संपन्न नागरिकों को भामाशाह की भांति अपनी संपत्ति का त्याग कर देश की प्रगति और रक्षा में अपना अमूल्य सहयोग देना चाहिए।
In simple words: भामाशाह मेवाड़ के एक बहुत बड़े दानी थे। उनका उदाहरण इसलिए दिया गया है ताकि अमीर लोग जरूरत पड़ने पर देश की मदद के लिए अपना धन त्याग सकें।

Exam Tip: भामाशाह के ऐतिहासिक परोपकार और देश की आर्थिक संकटकालीन स्थिति में धनपतियों के कर्तव्य को उत्तर में स्पष्ट करें।

 

Question 14. कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया?
Answer: कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी को उनके उत्कृष्ट हिंदी साहित्य सृजन व पत्रकारिता के क्षेत्र में अतुलनीय सेवाओं के लिए भारत सरकार द्वारा सम्मानपूर्वक "पद्म श्री" पुरस्कार से अलंकृत किया गया।
In simple words: लेखक कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' को उनकी महान साहित्यिक रचनाओं के लिए भारत सरकार द्वारा 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया था।

Exam Tip: भारत के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान 'पद्म श्री' का नाम आदरपूर्वक और स्पष्ट रूप से लिखें।

 

Question 15. निबंध की लेखन-शैली की सबसे बड़ी विशेषता क्या है?
Answer: प्रभाकर जी के इस निबंध शिल्प की सबसे विशिष्ट खूबी इसकी प्रश्नोत्तर अथवा संवादात्मक शैली है। इसमें लेखक स्वयं अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए प्रश्न उठाते हैं और फिर बड़ी आत्मीयता से स्वयं ही उनका तार्किक उत्तर प्रस्तुत करते हैं, जिससे पाठक का ध्यान अंत तक बना रहता है।
In simple words: इस निबंध की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सवाल - जवाब की तरह लिखा गया है, जिससे पाठक को ऐसा लगता है जैसे लेखक सीधे उससे बात कर रहे हैं।

Exam Tip: प्रश्नोत्तर शैली के संवादात्मक पहलू और उसके पाठकों पर पड़ने वाले सीधे प्रभाव का उल्लेख उत्तर में करें।

 

लघु उत्तरीय प्रश्न उत्तर

 

Question 1. “मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं” – इस कथन का आशय क्या है?
Answer: इस कथन के द्वारा निबंधकार यह प्रतिपादित करना चाहते हैं कि किसी भी राष्ट्र और उसके नागरिकों के हित आपस में पूरी तरह जुड़े हुए हैं, उन्हें कभी भी एक - दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने व्यक्तिगत लाभ, सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए अपने दैनिक जीवन की छोटी - छोटी बातों पर विशेष ध्यान देता है, ठीक वैसे ही अपने राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों का निर्वहन करना भी उसका सबसे पहला उत्तरदायित्व है। किसी भी सजग नागरिक का निजी मान - सम्मान ही अंततः उसके देश के गौरव का आधार बनता है, और नागरिक का पतन सीधे तौर पर देश की गरिमा को नुकसान पहुँचाता है।
In simple words: इस पंक्ति का अर्थ है कि देश और उसके नागरिक एक - दूसरे से अलग नहीं हैं। हमारा मान - सम्मान ही हमारे देश का मान - सम्मान है, और हमारी बुराई ही देश की बुराई बनती है।

Exam Tip: नागरिक और राष्ट्र के परस्पर 'अविभाज्य संबंध' को और उनके साझी अस्मिता के सिद्धांत को इस उत्तर में विस्तार से स्पष्ट करें।

 

Question 2. “जीवन एक युद्ध है” – इस उदाहरण से लेखक क्या कहना चाहता है?
Answer: कवि इस सुंदर उदाहरण के माध्यम से यह संदेश देना चाहते हैं कि एक आम और साधारण मनुष्य भी अपने छोटे - छोटे दैनिक कर्मों के जरिए देश की सेवा में अत्यंत मूल्यवान योगदान दे सकता है। किसी भी बड़े समर या युद्ध में विजय केवल अग्रिम मोर्चे पर बंदूक चलाने वाले सैनिकों से नहीं मिलती; पृष्ठभूमि में खेती कर अनाज उगाने वाले किसानों और सैनिकों का हौसला बढ़ाने वाले नागरिकों का श्रम भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। इसी प्रकार, हर एक नागरिक अपने नियत कर्तव्यों को ईमानदारी से पूरा करके देश - निर्माण में अपनी अहम भागीदारी निभा सकता है।
In simple words: जीवन एक युद्ध की तरह है जहाँ केवल सीमा पर लड़ना ही काम नहीं है। हर नागरिक - चाहे वह किसान हो, छात्र हो या मजदूर - अपने काम को ईमानदारी से करके देश की सेवा कर सकता है।

Exam Tip: युद्ध में पीछे रहकर रसद उगाने और सहयोग देने वाले पक्षों की तुलना नागरिक के सामान्य कर्तव्यों से करते हुए उत्तर स्पष्ट करें।

 

Question 3. जापानी युवक की कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?
Answer: स्वामी रामतीर्थ के प्रसंग में उस छोटे से जापानी बालक ने फलों के मूल्य स्वरूप केवल यह मांग की कि वे अपने देश जाकर कभी जापान की निंदा न करें। इस प्रेरक घटना से हमें यह उत्तम शिक्षा प्राप्त होती है कि राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किसी बड़े पद, अत्यधिक धन या विशेष शक्ति की आवश्यकता नहीं होती। एक साधारण से साधारण नागरिक भी अपने दैनिक जीवन के छोटे, मर्यादित और निश्छल प्रयासों से अपने देश के स्वाभिमान को दुनिया के सामने सर्वोच्च स्तर पर स्थापित कर सकता है।
In simple words: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि देश से प्यार करने के लिए अमीर या बड़े पद पर होना जरूरी नहीं है। हम अपने छोटे - छोटे अच्छे कामों से भी अपने देश का मान बढ़ा सकते हैं।

Exam Tip: जापानी युवक के 'निःस्वार्थ राष्ट्रप्रेम' को उत्तर का मुख्य बिंदु बनाकर स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करें।

 

Question 4. पुस्तकालय वाली घटना से क्या सीख मिलती है?
Answer: पुस्तकालय के इस प्रसंग से हमें यह गंभीर सामाजिक सीख प्राप्त होती है कि किसी भी नागरिक का कोई भी अशोभनीय या गैर - जिम्मेदार कार्य केवल उसके व्यक्तिगत चरित्र को ही लांछित नहीं करता, अपितु पूरे राष्ट्र के गौरव को वैश्विक स्तर पर कलंकित कर देता है। चित्र चुराने वाले उस छात्र की एक छोटी सी चोरी के कारण उस देश के सभी नागरिकों के प्रवेश पर सदैव के लिए प्रतिबंध लगा दिया गया। यह सिद्ध करता है कि एक व्यक्ति का अनुचित आचरण पूरे देश के सम्मान को ठेस पहुँचाता है, इसलिए हमें हमेशा मर्यादित व्यवहार करना चाहिए।
In simple words: इस घटना से हमें यह सीख मिलती है कि हमारा एक गलत काम भी हमारे पूरे देश का सिर शर्म से झुका सकता है, क्योंकि एक की गलती की सजा पूरे देश को भुगतनी पड़ती है।

Exam Tip: व्यक्तिगत चरित्र और 'राष्ट्रीय गरिमा' के सीधे संबंध को पुस्तकालय के प्रतिबंधात्मक बोर्ड के उदाहरण से पुष्ट करें।

 

Question 5. “शक्ति-बोध” और “सौंदर्य-बोध” को नुकसान पहुँचाने वाले कौन-कौन से कार्य हैं?
Answer: निबंधकार के अनुसार, देश के आत्मबल और स्वाभिमान को गहरी चोट पहुँचाने वाले कार्य निम्नलिखित हैं:

• 'शक्ति - बोध' को खंडित करने वाले कार्य: अपने राष्ट्र की प्रगति की व्यर्थ ही दूसरे देशों से हीन तुलना करना, सदैव देश की कमियों या बुराइयों का ढिंढोरा पीटना और देशवासियों के आत्मविश्वास को कमजोर करना।

• 'सौंदर्य - बोध' को नष्ट करने वाले कार्य: सार्वजनिक रास्तों पर केले के छिलके फेंकना, अपने घर का कूड़ा गलियों में बिखेरना, अपनी बातचीत में अशिष्ट व गंदे शब्दों का प्रयोग करना, और हमारी बहुमूल्य ऐतिहासिक धरोहरों पर नाम लिखकर या थूककर उन्हें गंदा व बदरंग करना।

ये सभी नकारात्मक कार्य राष्ट्र के आंतरिक बल और बाहरी सुंदरता दोनों को गहरा नुकसान पहुँचाते हैं।
In simple words: देश की बुराई करना हमारे 'शक्ति - बोध' को कमजोर करता है, और सड़कों पर कचरा फैलाना, दीवारों पर लिखना तथा गंदी भाषा का प्रयोग करना हमारे 'सौंदर्य - बोध' को नुकसान पहुँचाता है।

Exam Tip: दोनों पक्षों (शक्ति - बोध और सौंदर्य - बोध) को अलग - अलग उप - शीर्षकों के रूप में बिंदुवार लिखकर प्रस्तुत करें।

 

Question 6. कमालपाशा और भारतीय किसान की घटनाओं में क्या समानता है?
Answer: तुर्की के राष्ट्रपति कमालपाशा और भारत के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू से जुड़े इन दोनों प्रसंगों में अद्भुत समानता यह है कि दोनों ही उपहार भौतिक रूप से अत्यंत साधारण व मामूली थे; जहाँ एक ओर वृद्ध किसान का मात्र पाव - भर शहद था, वहीं दूसरी ओर भारतीय किसान के हाथों से रंगीन सुतलियों से बुनी गई एक खाट थी। किंतु इन साधारण वस्तुओं के पीछे उन दाताओं का हृदय पूरी तरह से निश्छल, शुद्ध और अगाध प्रेम से भरा हुआ था। दोनों ही महान राजनेताओं ने उपहार की कीमत के स्थान पर उन गरीबों के सच्चे भावों का पूर्ण आदर किया। यह उदाहरण यह सिद्ध करता है कि किसी भी कार्य का वास्तविक मूल्य उसकी भौतिक विशालता में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपी पावन भावना में होता है।
In simple words: दोनों ही उपहार - शहद और सुतली की खाट - बहुत साधारण थे, लेकिन उनके पीछे देने वाले का प्यार और भावना बिल्कुल सच्ची थी। दोनों बड़े नेताओं ने इस भावना का बहुत आदर किया।

Exam Tip: उत्तर में 'कमालपाशा का पाव - भर शहद' और 'भारतीय किसान की खाट' इन दोनों प्रतीकों के जरिए 'भाव की प्रधानता' के सिद्धांत को स्पष्ट करें।

 

Question 7. “अकेला चना क्या भाड़ फोड़े” कहावत को झूठ बताकर लेखक क्या कहना चाहता है?
Answer: निबंधकार इस पारंपरिक कहावत का खंडन करते हुए यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह धारणा सर्वथा निराधार है कि समाज का एक साधारण और आम नागरिक अकेले दम पर कोई बड़ा सकारात्मक परिवर्तन नहीं ला सकता। मानव सभ्यता का इतिहास साक्षी है कि जब भी किसी अकेले दृढ़निश्चयी मनुष्य ने संकल्प लिया, उसने समाज की दिशा को बदलकर रख दिया। इसलिए किसी भी देशवासी को यह सोचकर कभी हताश नहीं होना चाहिए कि उसके छोटे से प्रयास से राष्ट्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा। राष्ट्र - निर्माण में प्रत्येक नागरिक का छोटा से छोटा प्रयास भी अत्यंत मूल्यवान व दूरगामी होता है।
In simple words: लेखक कहना चाहते हैं कि यह सोचना गलत है कि एक अकेला इंसान कुछ नहीं बदल सकता। इतिहास में कई बार एक ही व्यक्ति ने बड़े - बड़े बदलाव किए हैं, इसलिए हर छोटा कदम मूल्यवान है।

Exam Tip: निराशावादी सोच के स्थान पर व्यक्ति की 'आत्मशक्ति' और 'सामूहिक योगदान के महत्व' को उत्तर में मुख्य रूप से उजागर करें।

 

Question 8. निबंध की प्रश्नोत्तर शैली इसे कैसे विशेष बनाती है?
Answer: कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी द्वारा प्रयुक्त प्रश्नोत्तर और संवादात्मक शैली इस निबंध को एक अनूठी और सजीव साहित्यिक विधा के रूप में प्रतिष्ठित करती है। यह शैली पाठक को केवल एक निष्क्रिय श्रोता नहीं रहने देती, बल्कि उसे विमर्श में सीधे भागीदार बनाती है। निबंध पढ़ते समय पाठक को ऐसा सुखद अनुभव होता है मानो वह स्वयं लेखक के सम्मुख बैठकर चर्चा कर रहा हो। इस अद्भुत शैली के कारण राष्ट्र और नागरिक कर्तव्य जैसे गंभीर व जटिल दार्शनिक विचार भी अत्यंत सहज, सुगम और मनोरंजक लगने लगते हैं, और उनके उत्तर पाठक के अंतर्मन में स्वाभाविक रूप से बैठ जाते हैं।
In simple words: इस निबंध की प्रश्नोत्तर शैली पाठक को ऐसा महसूस कराती है मानो लेखक उससे सीधे बात कर रहे हों, जिससे कठिन से कठिन विचार भी बहुत आसान और मजेदार लगने लगते हैं।

Exam Tip: संवादात्मक शैली की विशेषताओं जैसे - 'पाठक की सहभागिता' और 'जटिल विचारों का सरलीकरण' - को उत्तर में मुख्य रूप से विश्लेषित करें।

 

Question 9. चुनाव को देश की उच्चता और हीनता की कसौटी क्यों माना गया है?
Answer: लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव ही वह सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है जिसके द्वारा देश की जनता अपने राष्ट्र के भावी नेतृत्व और नीतियों का निर्धारण करती है। यदि देश के नागरिक जागरूक होकर, निष्पक्ष रूप से एक सुशिक्षित, ईमानदार और योग्य प्रतिनिधि का चयन करते हैं, तो राष्ट्र का विकास और विश्व पटल पर उसका मान बढ़ता है। इसके विपरीत, यदि मतदान संकीर्ण स्वार्थों, झूठी अफवाहों या गलत लोगों के प्रभाव में आकर अज्ञानतापूर्वक किया जाता है, तो देश का पतन सुनिश्चित हो जाता है। अतः चुनाव नागरिकों की राजनैतिक चेतना, उनके विवेक और राष्ट्र के प्रति उनकी संवेदनशीलता की सबसे बड़ी और सच्ची कसौटी है।
In simple words: चुनाव के द्वारा ही हम अपने देश के अच्छे या बुरे नेताओं को चुनते हैं। यदि हम सही व्यक्ति को चुनेंगे तो देश आगे बढ़ेगा, और गलत व्यक्ति को चुनने पर देश का नुकसान होगा। इसलिए चुनाव ही देश के भविष्य की कसौटी है।

Exam Tip: लोकतंत्र में मतदान की 'अहम जिम्मेदारी' और 'नागरिक जागरूकता' के सीधे संबंध को उत्तर का मुख्य केंद्र बनाकर लिखें।

 

Question 10. लाला लाजपत राय के अनुभव ने लेखक की सोच में क्या बदलाव लाया?
Answer: लाला लाजपत राय जी के मर्मस्पर्शी विदेशी यात्रा के कटु अनुभवों को जानने से पूर्व, लेखक अत्यंत संकीर्ण संतुष्टि के घेरे में जीते थे। वे स्वयं को अपने घर, पड़ोस और नगर के सीमित सुखों में ही एक परिपूर्ण मनुष्य मानकर संतुष्ट थे। किंतु लाला जी के इस सत्य वचन ने कि पराधीन देश का नागरिक चाहे कितना भी साधन - संपन्न हो, वह विदेशों में कभी सच्चा आदर नहीं पा सकता, लेखक के मन के उस भ्रम को सदा के लिए तोड़ दिया। इसके उपरांत, लेखक के मन में व्यापक राष्ट्रीय चेतना जाग्रत हुई और उन्होंने यह स्वीकार किया कि उनका और उनके देश का अस्तित्व एक - दूसरे से पूरी तरह अभिन्न है।
In simple words: लाला जी के अनुभव को जानकर लेखक को यह समझ आया कि जब तक हमारा देश गुलाम है, हम खुद को कभी भी पूरी तरह सुखी व सम्मानित नहीं मान सकते। तब से वे देश को खुद से अलग नहीं मानते।

Exam Tip: लेखक की पूर्व की 'संकीर्ण संतुष्टि' और लाला जी के कथन के प्रभाव से जाग्रत हुई 'राष्ट्रीय चेतना' के अंतर को उत्तर में स्पष्ट करें।

 

दीर्घ उत्तरीय प्रश्न उत्तर

 

Question 1. “मैं और मेरा देश” में लेखक ने व्यक्ति और देश के संबंध को किस प्रकार स्थापित किया है?
Answer: साहित्यकार कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी ने इस वैचारिक निबंध में व्यक्ति और उसके राष्ट्र के मध्य व्याप्त अत्यंत घनिष्ठ, आत्मीय और कभी न विलग होने वाले संबंध को अत्यंत सूक्ष्म दार्शनिक दृष्टिकोण से स्थापित किया है। निबंधकार की वैचारिक यात्रा व्यक्तिगत संकीर्णता से व्यापक राष्ट्रीय चेतना की ओर अग्रसर होती है। प्रारंभ में, वे अपने घर, आस - पड़ोस और नगर की सीमाओं के भीतर ही स्वयं को एक सुखी और पूर्ण मनुष्य मानकर संतुष्ट थे। किंतु पंजाब - केसरिलाला लाजपत राय जी के विदेशी अनुभवों ने उनकी इस संकीर्ण संतुष्टि को झकझोर दिया, जिसने यह कड़वा सत्य उद्घाटित किया कि पराधीन देश का नागरिक चाहे कितना भी ऐश्वर्यशाली या शिक्षित क्यों न हो, वह विश्व में कभी भी सच्चा मान - सम्मान प्राप्त नहीं कर सकता।
इसीलिए लेखक दृढ़ता से कहते हैं कि "मैं और मेरा देश दो अलग चीजें तो हैं ही नहीं।" वे जापान से जुड़े दो प्रेरक प्रसंगों (फलों वाली कहानी और पुस्तकालय से चित्र चुराने की घटना) के माध्यम से यह सिद्ध करते हैं कि एक अकेले नागरिक का आचरण सीधे तौर पर पूरे राष्ट्र की वैश्विक पहचान निर्धारित करता है। जहाँ जापानी युवक के निःस्वार्थ आचरण ने देश का मस्तक ऊँचा किया, वहीं चित्र चुराने वाले विदेशी छात्र के अनुचित कार्य ने उसके संपूर्ण देश को कलंकित कर दिया। अतः, लेखक का मूल संदेश यही है कि राष्ट्र का गौरव ही नागरिक का स्वाभिमान है, और नागरिक का पतन देश के अपमान का कारण बनता है। दोनों का अस्तित्व परस्पर पूर्णतः अभिन्न है।
In simple words: लेखक ने समझाया है कि नागरिक और देश का संबंध अटूट है। हमारे अच्छे काम देश का गौरव बढ़ाते हैं और हमारे बुरे काम देश का सिर शर्म से झुकाते हैं, इसलिए हम और हमारा देश कभी अलग नहीं हो सकते।

Exam Tip: व्यक्तिगत चेतना से राष्ट्रीय चेतना के विकास को क्रमिक ढंग से समझाते हुए, दोनों जापानी कहानियों के तुलनात्मक प्रभाव को उत्तर में विस्तार से लिखें।

 

Question 2. लेखक ने “शक्ति-बोध” और “सौंदर्य-बोध” के बारे में क्या कहा है? इन्हें नष्ट करने वाले काव्यों का उल्लेख कीजिए।
Answer: निबंधकार का यह सुदृढ़ विचार है कि किसी भी राष्ट्र की गरिमा और उसके अस्तित्व को बनाए रखने के लिए दो तत्वों की सर्वाधिक और सबसे पहले आवश्यकता होती है - 'शक्ति - बोध' और 'सौंदर्य - बोध'। इन दोनों का विस्तृत विश्लेषण निम्नलिखित है:

• 'शक्ति - बोध' का सिद्धांत और उसे क्षति पहुँचाने वाले कार्य: शक्ति - बोध का आशय अपने राष्ट्र के सामर्थ्य, उसकी एकता और सामूहिक बल पर अडिग विश्वास रखना है। जब कुछ नागरिक ट्रेनों, मुसाफिरखानों, क्लबों या ग्रामीण चौपालों पर अज्ञानतावश अपने देश की प्रगति की तुलना अन्य समृद्ध देशों से हीन मानकर करते हैं और सदैव देश की निंदा करते हैं, तो वे समाज के मानसिक बल को तोड़ते हैं। लेखक ने इसके लिए महाभारत के पात्र शल्य का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो अर्जुन की अजेयता का बार - बार उल्लेख कर कर्ण के आत्मविश्वास को हतोत्साहित करता था।

• 'सौंदर्य - बोध' का सिद्धांत और उसे नष्ट करने वाले कार्य: सौंदर्य - बोध का तात्पर्य हमारे आचरण में स्वच्छता, उच्च सुरुचि और सामाजिक - सांस्कृतिक मर्यादाओं का पालन करना है। जब लोग सड़कों पर केले के छिलके फेंकते हैं, अपने घरों का कचरा गलियों में बिखेरते हैं, अपशब्दों का प्रयोग कर गंदे भाव प्रकट करते हैं, या हमारी ऐतिहासिक धरोहरों पर पीक थूककर व दीवारों पर लिखकर उन्हें गंदा व बदरंग करते हैं, तो वे राष्ट्र के सौंदर्य - बोध को गंभीर ठेस पहुँचाते हैं.
लेखक स्पष्ट करते हैं कि इन दोनों मानवीय बोधों की रक्षा करना प्रत्येक सजग नागरिक का परम राष्ट्रीय कर्तव्य है, क्योंकि इन्हीं के बल पर देश की प्रतिष्ठा टिकी होती है।
In simple words: देश के लिए शक्ति - बोध (अपने देश पर भरोसा) और सौंदर्य - बोध (साफ - सफाई व आचरण की मर्यादा) सबसे जरूरी हैं। देश की बुराई करना शक्ति - बोध को नुकसान पहुँचाता है, और कचरा फैलाना या अभद्र भाषा का प्रयोग करना सौंदर्य - बोध को नष्ट करता है।

Exam Tip: 'शक्ति - बोध' और 'सौंदर्य - बोध' इन दोनों पक्षों को अलग - अलग उप - शीर्षकों के रूप में बिंदुवार विभाजित करके लिखें और शल्य के उदाहरण को तार्किक रूप से स्पष्ट करें।

 

Question 3. “महत्व किसी कार्य की विशालता में नहीं, उस कार्य के करने की भावना में है” – इस कथन को उदाहरणों सहित सिद्ध कीजिए।
Answer: निबंधकार ने इस आदर्श विचार को समाज के विभिन्न प्रेरक और व्यावहारिक उदाहरणों के माध्यम से पूरी प्रामाणिकता के साथ सिद्ध किया है। उनका मानना है कि किसी भी भेंट या कार्य का वास्तविक मूल्य उसकी भौतिक भव्यता या आकार से नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे निश्छल समर्पण और पवित्र भाव से तय होता है। इसे स्पष्ट करने वाले प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
१. जापानी युवक का निःस्वार्थ समर्पण: पहला प्रसंग उस जापानी युवक का है जिसने स्वामी रामतीर्थ को उत्तम फल लाकर भेंट किए और उसके मूल्य के बदले केवल यह वचन माँगा कि वे अपने देश जाकर कभी जापान की निंदा न करें। भौतिक रूप से यह अत्यंत लघु कार्य था, किंतु इसके पीछे अपने राष्ट्र के स्वाभिमान को सुरक्षित रखने की भावना हिमालय जैसी ऊँची थी।
२. तुर्की के ग्रामीण वृद्ध का आदर भाव: दूसरा उदाहरण तुर्की के एक निर्धन बूढ़े किसान का है जो तपती धूप में तीस मील पैदल चलकर नवनिर्वाचित राष्ट्रपति कमालपाशा के लिए अपनी कुटिया से मात्र पाव - भर शुद्ध शहद का उपहार लेकर आया था। शहद भौतिक रूप से अत्यंत तुच्छ वस्तु थी, किंतु वृद्ध की आँखों में देश के नायक के प्रति असीम आदर, पवित्र प्रेम और सच्ची निष्ठा का भाव था, जिसे कमालपाशा ने भी सिर नवाकर स्वीकार किया।
३. भारतीय किसान का स्नेहमयी उपहार: तीसरा सुंदर प्रसंग हमारे अपने देश के एक साधारण किसान का है जिसने अपने हाथों से रंगीन सुतलियों से बुनी हुई एक खाट रेलगाड़ी के जरिए दिल्ली पहुँचाई और उसे देश के प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को भेंट की। खाट कोई राजसी उपहार नहीं था, परंतु किसान की उस अनमोल आत्मीयता और प्रेम की सच्ची भावना को देखकर नेहरू जी ने भी उसे दस्तखत युक्त चित्र देकर उसका मान बढ़ाया।
कवि इसके विपरीत पहलू को भी दर्शाते हैं कि जहाँ इन साधारण उपहारों के पीछे छिपी महान भावना ने देश का मस्तक ऊँचा किया, वहीं पुस्तकालय से दुर्लभ चित्र चुराने वाले उस विदेशी छात्र के एक छोटे से स्वार्थी व अशोभनीय कृत्य ने उसके संपूर्ण राष्ट्र को कलंकित कर दिया। अतः यह पूर्णतः सिद्ध होता है कि कार्य का महत्व उसकी विशालता में नहीं, बल्कि उसके पीछे की भावना में होता है।
In simple words: कवि ने समझाया है कि किसी काम का महत्व उसके बड़े होने में नहीं, बल्कि उसे करने वाले के दिल और भावना में होता है। जैसे कमालपाशा को शहद देने वाले किसान और नेहरू जी को खाट भेंट करने वाले किसान के उपहार छोटे थे, पर उनका प्यार बहुत बड़ा था।

Exam Tip: इस उत्तर में दिए गए तीनों सकारात्मक उदाहरणों (जापानी युवक, तुर्की का वृद्ध और भारतीय किसान) को अलग - अलग बिंदुओं में वर्गीकृत कर लिखें और अंत में चोरी वाली घटना के नकारात्मक प्रभाव से इसकी तुलना करें।

 

Question 4. पाठ की प्रश्नोत्तर शैली और निबंध विधा की विशेषताओं का विश्लेषण कीजिए।
Answer: कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' जी द्वारा रचित 'मैं और मेरा देश' हिंदी साहित्य की निबंध विधा का एक अत्यंत उत्कृष्ट और मील का पत्थर उदाहरण है। इस रचना की विधागत और शैलीगत मुख्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
१. प्रश्नोत्तर एवं संवादात्मक शैली का चमत्कार: इस निबंध की सबसे बड़ी विशिष्टता इसकी प्रश्नोत्तर शैली है, जहाँ लेखक स्वयं "क्या कोई भूकंप आया था?" या "क्या मानस में कोई भूकंप उठा था?" जैसे प्रश्न पूछते हैं और फिर आत्मीयता से स्वयं ही उनका तर्कपूर्ण प्रत्युत्तर देते हैं। यह शैली पाठक को एक नीरस पाठक न रखकर विमर्श का एक सजीव अंग बना देती है, जिससे कठिन से कठिन वैचारिक मुद्दे भी अत्यंत सरल, सुगम और रोचक लगने लगते हैं।
२. अटूट विषय - केंद्रीयता: निबंध विधा की शास्त्रीय कसौटी पर यह रचना पूर्णतः खरी उतरती है। इसका पूरा ताना - बाना प्रारंभ से अंत तक एक ही केंद्रीय विषय - 'नागरिक और देश का अनन्य अंतर्संबंध' - के इर्द - गिर्द बहुत मजबूती से बुना गया है। पूरा विमर्श इसी मुख्य धुरी पर घूमता है।
३. सजीव प्रतीक और चित्रात्मकता: प्रभाकर जी ने अमूर्त विचारों को सजीव आकार देने के लिए 'भूकंप', 'दरार' और 'गाँठ' जैसे सरल व रोजमर्रा के प्रतीकों का प्रयोग किया है। ये प्रतीक पाठकों के मन पर एक अमिट छाप छोड़ते हैं और निबंध को चित्रात्मक बनाते हैं।
४. साहित्यिक सौंदर्य और पौराणिक संदर्भ: महाभारत के पात्र शल्य का उदाहरण देकर लेखक ने देश के आत्मविश्वास (शक्ति - बोध) को तोड़ने वाले तत्वों की तुलना शल्य के सारथी धर्म से की है। यह सुंदर संदर्भ निबंध में गहन साहित्यिक मर्यादा और सांस्कृतिक गरिमा जोड़ता है।
५. घनिष्ठ वैयक्तिकता: निबंधकार ने पूरे आलेख में उत्तम पुरुष ('मैं') का प्रयोग करते हुए अपने निजी अनुभवों, संकोचों और वैचारिक विकास को सीधे पाठकों के समक्ष रखा है। यही वैयक्तिकता इस निबंध की सजीव आत्मा है जो इसे एक नीरस उपदेश बनने से बचाती है।
In simple words: यह निबंध सवाल - जवाब की अनोखी शैली में लिखा गया है, जिससे यह बहुत रोचक लगता है। इसमें लेखक ने अपने व्यक्तिगत अनुभवों, सरल प्रतीकों और कहानियों का उपयोग करके नागरिक और देश के गहरे संबंध को बहुत खूबसूरती से समझाया है।

Exam Tip: इस उत्तर को स्पष्ट करने के लिए निबंध की प्रमुख शैलियों (जैसे संवादात्मकता, विषय-केंद्रीयता, चित्रात्मकता और वैयक्तिकता) को अलग-अलग शीर्षकों के अंतर्गत विश्लेषणात्मक ढंग से प्रस्तुत करें।

 

Question 5. “मैं और मेरा देश” निबंध एनईपी 2020 की दृष्टि से और आज के संदर्भ में किस प्रकार प्रासंगिक है?
Answer: यद्यपि इस निबंध की रचना सन १९३९ की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में की गई थी, किंतु इसके भीतर व्यक्त किए गए दार्शनिक विचार आज के समकालीन भारत और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी २०२०) के परिप्रेक्ष्य में अत्यधिक प्रासंगिक, व्यावहारिक और प्रेरणादायक हैं। इसकी वर्तमान प्रासंगिकता को हम निम्नलिखित आयामों से समझ सकते हैं:
१. एनईपी २०२० के मूलभूत सिद्धांतों के अनुरूप: भारत की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) विद्यार्थियों के भीतर केवल किताबी ज्ञान का नहीं, अपितु उच्च संवैधानिक मूल्यों, नागरिक कर्तव्यों, समाज के प्रति जिम्मेदारी और सुदृढ़ राष्ट्रीय चेतना के विकास पर विशेष बल देती है। यह निबंध इन सभी अमूर्त और महत्वपूर्ण मूल्यों को सूखे उपदेशों के रूप में नहीं, बल्कि सजीव व जीवंत व्यावहारिक उदाहरणों (जैसे जापानी युवक और किसान की कहानी) के माध्यम से पाठकों के अंतःकरण में स्थापित करता है।
२. स्वच्छ भारत अभियान और सौंदर्य - बोध का अंतर्संबंध: वर्तमान समय में हमारे देश में चल रहे 'स्वच्छ भारत अभियान' की वास्तविक सफलता पूरी तरह से देश के नागरिकों के सौंदर्य - बोध (स्वच्छता के प्रति संवेदनशीलता और सुरुचि) पर ही टिकी हुई है। लेखक ने दशकों पूर्व यह स्पष्ट कर दिया था कि सड़कों पर कूड़ा फेंकना या गंदगी फैलाना केवल हमारे परिवेश को ही गंदा नहीं करता, बल्कि यह हमारे राष्ट्रीय स्वाभिमान व सौंदर्य - बोध को गहरी चोट पहुँचाता है।
३. सोशल मीडिया के दौर में 'शक्ति - बोध' की रक्षा: आज के डिजिटल और सोशल मीडिया के युग में, अपने ही देश की कमियों का सार्वजनिक रूप से उपहास उड़ाना, देश विरोधी बातें फैलाना या नकारात्मकता का प्रचार करना हमारे 'शक्ति - बोध' (सामूहिक राष्ट्रीय आत्मविश्वास) को नष्ट करने का काम कर रहा है। निबंधकार का शल्य - कर्ण वाला पौराणिक उदाहरण हमें यह सीख देता है कि हमें अपने देश की मानसिक शक्ति को कभी भी कमजोर नहीं होने देना चाहिए।
४. लोकतंत्र की मजबूती और मतदान का महत्व: वर्तमान समय में भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के लिए नागरिकों द्वारा निष्पक्ष व जागरूक होकर मतदान करना सर्वाधिक आवश्यक है। निबंधकार ने 'चुनाव' को राष्ट्र की उच्चता और हीनता की कसौटी बताकर आज के युवा मतदाताओं को अपनी नागरिक जिम्मेदारी का सही अहसास कराया है।
संक्षेप में कहें, तो यह निबंध आज के युवाओं को यह मूल्यवान व्यावहारिक सीख देता है कि सच्ची देशभक्ति केवल बड़ी - बड़ी मंचों पर भाषण देने में नहीं, बल्कि अपने दैनिक छोटे - छोटे आचरणों, ईमानदारी और नागरिक कर्तव्यों के सुचारू निर्वहन में छिपी होती है।
In simple words: यह निबंध आज के समय में बहुत जरूरी है क्योंकि यह हमें सिखाता है कि असली देशभक्ति भाषणों में नहीं, बल्कि हमारे रोज़ के छोटे - छोटे कामों जैसे साफ - सफाई रखने, सही मतदान करने और अपने देश पर गर्व करने में होती है।

Exam Tip: उत्तर को आधुनिक संदर्भों (जैसे स्वच्छ भारत अभियान, सोशल मीडिया का प्रभाव और एनईपी 2020 के दिशा - निर्देशों) से जोड़कर विश्लेषणात्मक ढंग से प्रस्तुत करें।

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